नवभारत विशेष: क्या नेपाल दूसरा 'पाकिस्तान' बन रहा है ?, भारत की जमीन पर कब्जे का दावा

India Nepal Border: नेपाल के प्रधानमंत्री के सीमा संबंधी बयान पर संसद में विवाद खड़ा हो गया। विपक्ष ने सबूत मांगे, जबकि विदेश मंत्रालय ने सफाई देते हुए बयान का अलग संदर्भ बताया।
Navbharat Special: Is Nepal Becoming Another 'Pakistan'?Claims of Encroaching on Indian Territory
नेपाल राजनीति, भारत-नेपाल संबंध, सीमा विवाद,(सोर्स: सोशल मीडिया)
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India Nepal Border Dispute: नेपाल के विपक्षी नेताओं ने यह कहकर संसद में अपने प्रधानमंत्री को घेरा कि वो या तो सबूत दिखाएं कि नेपाल ने भारत की जमीन पर कहां कब्जा किया है या फिर वह अपने बयान को वापस लें। इस भूचाल के बाद नेपाल के विदेश मंत्रालय को सफाई देनी पड़ी है कि प्रधानमंत्री नो मैन्स लैंड की उस जमीन के बारे में बात कर रहे थे, जहां दोनों तरफ के किसान कई जगहों पर कब्जा करके खेती कर रहे हैं। नेपाल और भारत के बीच कालापानी, लिपुलेक और लिंपियाधुरा को लेकर सीमा विवाद है।

भारत इन्हें उत्तराखंड का हिस्सा मानता है, जबकि नेपाल का दावा है कि ये उसके हिस्से हैं। सवाल है जब भारत और नेपाल के बीच एक कारगर संधि मौजूद है। फिर ऐसे किसी विवाद पर एक या दो देशों की मध्यस्थता को बीच में लाने का क्या मतलब है? भारत का अब ब्रिटेन से कोई संबंध नहीं है, भारत आखिर क्यों चाहेगा कि उसके किसी मामले में ब्रिटेन अपनी टांग अड़ाए? भारत और नेपाल के बीच पहली संधि 1816 में (सुगौली संधि) नेपाल और ब्रिटिश इंडिया के बीच हुई हो, लेकिन 1947 के बाद भारत के किसी भी मामले से ब्रिटेन का कोई मतलब नहीं रह गया और 1816 की संधि का 2016 में नवीनीकरण भी हो चुका है।

भावनात्मक बयानबाजी से बढ़ सकती हैं सीमा संवेदनशीलताएं

बालेन शाह अपेक्षाकृत युवा नेता हैं, राष्ट्रीय राजनीति में उनका अनुभव सीधे प्रधानमंत्री बनने का है, उससे पहले संसदीय राजनीति का कोई अनुभव नहीं रहा। इसलिए उनका वक्तव्य भावनात्मक अधिक और कूटनीतिक कम था। 2020 में नेपाल द्वारा एक ऐसे मानचित्र को संवैधानिक मान्यता दी गई थी, जिस पर भारत ने आपत्ति जताई थी। क्योंकि उस मानचित्र में लिपुलेक और काला पानी को नेपाल का हिस्सा बताया गया था। जबकि ये भारत के हिस्से हैं। लिपुलेक और काला पानी क्षेत्र भारत-नेपाल-तिब्बत के उस त्रिकोण में स्थित है, जहां चीन जरा-सा मौका पाते ही अपनी टांग अड़ाकर भारत की रणनीतिक चिंताओं को बढ़ा सकता है। भारत और नेपाल के बीच जो लंबी सीमारेखा है, वह पूरी तरह से खुली हुई है, यहां किसी तरह की कोई बाड़बंदी नहीं है। हर दिन हजारों नेपाली नागरिक भारत आते हैं और भारत से लोग नेपाल जाते हैं।

भारत-नेपाल संबंधों में सौहार्द बनाए रखना जरूरी

उत्तर प्रदेश और बिहार कई सीमावर्ती क्षेत्रों में भारत और नेपाल के लोगों के बीच आपस में रोटी और बेटी के संबंध हैं। कई लोग तो रहते नेपाल हैं और उनके खेत भारत में हैं और कई भारत में रहते हैं और उनके खेत नेपाल में हैं। दोनों देशों की धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिकता एक है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि कुछ वर्षों पहले तक नेपाल दुनिया का एकमात्र अधिकृत हिंदू राष्ट्र था। दोनों देशों के नागरिकों के बीच दो अलग-अलग देशों की भावना कतई कट्टरवादी नहीं है।

नेपाल के लोग भारत को भी अपना देश ही मानते हैं और भारतीय भी नेपाल को लेकर यही सोच रखते हैं। 40 लाख से ज्यादा नेपाल के लोग भारत में रहकर अपनी रोजी-रोटी कमाते हैं। भारत की सेना में भी नेपाल के लोगों को विशेषकर गोरखाओं को भर्ती किया जाता है। अगर कट्टरवादी राष्ट्रीयताओं का जहर फैलेगा तो भारतीय सेना में गोरखाओं की मौजूदगी कैसे रह पाएगी? इसलिए नेपाल और भारत दोनों को ही इस बेहद संवेदनशील मामले में बिना देर किए एक्शन लेना होगा।

भारत की जमीन पर कब्जे का दावा

भारत और नेपाल के संबंध सदियों से रहे हैं। दोनों देशों के बीच न केवल खुली सीमा है, बल्कि सदियों से ही रोटी-बेटी का संबंध भी है। धार्मिक-सांस्कृतिक निकटता और गहरी ऐतिहासिक साझेदारी है, लेकिन हाल के दशकों में जिस तरह नेपाल और भारत के इन ऐतिहासिक रिश्तों में रह-रहकर दरार आती रही है। सबसे बड़ी चोट तब लगी, जब नेपाल के प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह ने यह कहकर सनसनी मचा दी, 'भारत ने ही नेपाल की जमीन पर कब्जा नहीं किया, नेपाल ने भी भारत की जमीन पर कब्जा किया हुआ है।' इस विवाद को निपटाने के लिए उन्होंने चीन और ब्रिटेन से भी बात की है।

लेख-लोकमित्र गौतम के द्वारा

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