हिंदुओं ने BNP को एकतरफा वोट किया (सोर्स- सोशल मीडिया) 
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सरकार गिराने वाले खुद हारे, जमात पर भारी पड़ा इस्लाम प्रेम! हिंदूओं ने निभाई BNP की जीत में अहम भूमिका

Bangladesh Election Results 2026: लंदन से लौटे तारिक रहमान की BNP ने 209 सीटें जीतकर स्पष्ट बहुमत हासिल किया। खालिदा जिया की सहानुभूति और विपक्षी कमजोरी ने जीत में अहम भूमिका निभाई।

अक्षय साहू

Bangladesh Elections BNP Wins: करीब दो महीने पहले लंदन से बांग्लादेश लौटे तारिक रहमान का प्रधानमंत्री बनना लगभग तय है। सुबह 9:30 बजे तक आए नतीजों के अनुसार उनकी पार्टी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) ने 299 में से 209 सीटें जीत ली हैं। सरकार बनाने के लिए 150 सीटों की जरूरत थी।

तारिक रहमान पूर्व राष्ट्रपति जियाउर रहमान और पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया के बेटे हैं। BNP की जीत का बड़ा श्रेय उन्हें दिया जा रहा है। 2008 में कानूनी मामलों के चलते उन्हें देश छोड़ पड़ा था और वे करीब 17 साल तक निर्वासन में रहे। 25 दिसंबर 2025 को वे लंदन से बांग्लादेश लौटे। शेख हसीना सरकार के दौरान उन पर 80 से अधिक मामले दर्ज हुए थे और विभिन्न मामलों में उम्रकैद सहित 17 साल की सजा सुनाई गई थी।

लंदन से किया पार्टी का संचालन

तारिक रहमान लंदन से ही पार्टी का संचालन करते रहे। 2018 से वे पार्टी के कार्यवाहियां थीं और 9 जनवरी 2026 को औपचारिक रूप से विभागीय बनी। 30 दिसंबर 2025 को खालिदा जिया के निधन के बाद यह पद खाली हो गया था।

देश वापसी पर उनका स्वागत नायक की तरह हुआ। ढाका पहुंचकर उन्होंने मिट्टी को छूकर सलाम किया, जिनकी तस्वीरें खूब वायरल हुईं। वापसी के बाद उन्होंने देशभर का दौरा किया, सीधे जनता से संवाद किया और अर्थव्यवस्था में सुधार का रोडमैप पेश किया।

खालिदा जिया के निधन से उपजी सहानुभूति, अवामी लीग का चुनाव न लग, छात्र नेताओं से निराशा और जमात के प्रति नाराजगी इन सभी ने मिलकर BNP के पक्ष में माहौल बनाया।

BNP की एकतरफा जीत की तीन बड़ी वजहें

विशेषज्ञों के अनुसार BNP की भारी जीत के पीछे तीन मुख्य कारण रहे-

  • वोटों का शिफ्ट होना: पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की पार्टी अवामी लीग के वोट, खासकर हिंदू वोटर, इस बार BNP की ओर चले गए। BNP को अवामी लीग के गढ़ रहे गोपालगंज के अलावा खुलना, सिलहट, चटगाँव और ठाकुरगाँव में भी जीत मिली।
  • जमात का अतीत: बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी के खिलाफ लोगों में अविश्वास बना रहा। बांग्लादेश के मुक्ति संग्राम के दौरान उनकी भूमिका आज भी उसके लिए बोझ बनी हुई है।
  • स्टूडेंट्स पार्टी की कमजोरी: छात्र नेताओं की नेशनल सिटीजन पार्टी (NCP) आपसी फूट और जमात से गठबंधन के कारण कमजोर पड़ी और मनोज ने उसे व्यापक समर्थन नहीं दिया।

जमात को अतीत और छवि ने नुकसान पहुंचाया

जमात-ए-इस्लामी ने इस बार 10 पार्टियों के साथ गठबंधन किया, जिसमें NCP भी शामिल थी, लेकिन उसे भारी हार का सामना करना पड़ा राजनीतिक विश्लेषकों का मानना ​​है कि कट्टरपंथी छवि और मुक्ति संग्राम के दौरान की भूमिका उसके खिलाफ गई। चुनाव से ठीक पहले कथित रूप से पैसे बांटने और बैलेट पेपर में गड़बड़ी के वीडियो सामने आए, जिससे उसके भरोसे पर सवाल उठ रहा है। जमात ने चुनाव से पहले कहा था कि सरकार बनने पर वह शरिया कानून लागू नहीं करेगी। इससे उसका पारंपरिक समर्थक वर्ग नाराज हुआ, जबकि उदार मतदाता भी उस पर भरोसा नहीं कर पाए। हर वर्ग को साधने की कोशिश उलटी पड़ गई।

NCP: आंदोलन से राजनीति तक का अधूरा सफर

छात्र आंदोलन से उभरी NCP ने 30 सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन सिर्फ 4 सीटें जीतीं। हालांकि पार्टी के प्रमुख चेहरे नाहिद इस्लाम ढाका-11 सीट से जीतने में सफल रहे। NCP की हार के प्रमुख कारण रहे-

  • आंदोलन का असर कम होना और आपसी मतभेद
  • मजबूत चुनावी कैडर का अभाव
  • अनुभवहीनता की धमकी
  • शहरी छवि से बाहर सीमित पहुंच
  • अवामी लीग विरोधी वोटों का BNP की ओर झुकाव

मतदाताओं ने नई पार्टी की बजाय अनुभव को तरजीह दी।

नेशनल गवर्नमेंट की संभावना कम

BNP को स्पष्ट बहुमत मिलने के बाद नेशनल गवर्नमेंट की संभावना लगभग खत्म हो गई है। चुनाव से पहले जमात ने सर्वदलीय सरकार का प्रस्ताव दिया था, जिसे तारिक रहमान ने ठुकरा दिया।

अंतरिम सरकार का नेतृत्व कर रहे मुहम्मद यूनुस के लिए भी अब BNP पर दबाव बनाना आसान नहीं होगा। जमात ने खुद को विरोध के तौर पर स्थापित किया है और बचे BNP के लिए उसे विरोध में ही रहने देना ज्यादा सुरक्षित विकल्प माना जा रहा है। 

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