Ballia School Mid Day Meal Irregularities: जिले के ताजपुर मुड़ियारी इंटर कॉलेज में मध्याह्न भोजन योजना को लेकर सामने आई जांच ने सरकारी निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। कक्षा 6 से 8 के बच्चों ने स्कूल में भोजन नहीं मिलने की शिकायत सीधे जिलाधिकारी से करने का रास्ता चुना। बच्चों को जिलाधिकारी का पता मालूम नहीं था, लिहाजा उन्होंने Google की मदद से पता खोजा और परिवार के सहयोग से डाक के जरिए जिलाधिकारी को गोपनीय चिट्ठी भेजी। बच्चों ने पत्र में अपनी पहचान सार्वजनिक न करने की भी अपील की।
बच्चों की शिकायत को जिलाधिकारी मंगला प्रसाद सिंह ने गंभीरता से लेते हुए BSA मनीष कुमार सिंह और DDO आनंद प्रकाश को जांच के निर्देश दिए। जांच से जुड़ी रिपोर्ट के अनुसार स्कूल में करीब दो वर्षों से मध्याह्न भोजन का वास्तविक संचालन नहीं हो रहा था, जबकि अभिलेखों में करीब 200 बच्चों को नियमित भोजन दिए जाने का उल्लेख मिलता रहा।
जांच के दौरान स्कूल की रसोई में गैस सिलिंडर, राशन और आवश्यक बर्तन तक नहीं मिले। रसोइये की उपस्थिति भी नहीं मिली। वहीं U-DISE, IVRS में दर्ज छात्र संख्या और उपस्थिति पंजिका के आंकड़ों में भी अंतर सामने आने की बात कही गई है। इससे मिड-डे मील योजना के संचालन और अभिलेखों की सत्यता पर सवाल खड़े हुए हैं।
जांच संबंधी रिपोर्ट के मुताबिक वित्तीय वर्ष 2024-25 से 2026-27 के बीच ₹13,71,573 की कथित अनियमित राशि सामने आई है। जिलाधिकारी ने प्रधानाचार्य चंद्रशेखर पांडेय और जिला समन्वयक MDM अजीत पाठक को जिम्मेदार मानते हुए रकम की रिकवरी और सुसंगत धाराओं में FIR दर्ज कराने के निर्देश दिए हैं। हालांकि जांच और विभागीय कार्रवाई अभी जारी है, इसलिए इस राशि को अंतिम न्यायिक निर्णय से पहले ‘गबन’ के बजाय जांच में सामने आई कथित वित्तीय अनियमितता कहना उचित होगा।
मामले ने अब राष्ट्रीय स्तर पर भी ध्यान खींचा है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने 28 अगस्त को मीडिया रिपोर्टों के आधार पर स्वतः संज्ञान लेते हुए उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव को नोटिस जारी किया है। आयोग ने दो सप्ताह के भीतर विस्तृत रिपोर्ट मांगी है। आयोग के अनुसार यदि रिपोर्ट में सामने आए तथ्य सही हैं तो मामला बच्चों के मानवाधिकारों और पोषण से जुड़े गंभीर प्रश्न खड़े करता है।
मिड-डे मील की निगरानी के लिए BEO, ब्लॉक स्तरीय टास्क फोर्स, MDM समन्वयक, U-DISE और IVRS जैसी व्यवस्थाएं मौजूद हैं। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि यदि करीब दो वर्षों तक बच्चों को भोजन नहीं मिला और रिकॉर्ड में करीब 200 बच्चों को रोज भोजन दिए जाने का दावा होता रहा, तो निरीक्षण और निगरानी की पूरी व्यवस्था को यह कथित गड़बड़ी क्यों नहीं दिखाई दी?
सबसे अहम पहलू यह है कि सरकारी तंत्र की कई परतों के बावजूद मामले को सामने लाने का काम कक्षा 6 से 8 के बच्चों ने किया। उन्होंने Google पर DM का पता खोजा, परिवार की मदद से पत्र भेजा और अपनी पहचान गोपनीय रखने का अनुरोध किया।
बच्चों की यह पहल नई पीढ़ी की डिजिटल समझ और अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता को सामने लाती है। हालांकि उन्हें ‘Gen Alpha’ कहना पूरी तरह सार्वभौमिक आयु-परिभाषा पर निर्भर करता है, लेकिन इतना जरूर है कि इन बच्चों ने व्यवस्था तक अपनी बात पहुंचाने के लिए उपलब्ध डिजिटल साधनों का इस्तेमाल किया।
अब सवाल सिर्फ ₹13.71 लाख की कथित अनियमितता का नहीं है। सवाल यह भी है कि यदि बच्चों ने जिलाधिकारी को चिट्ठी नहीं भेजी होती तो कागजों पर दर्ज करीब 200 बच्चों की थालियां आखिर कब तक भरती रहतीं? मामला जांच के दायरे में है और आगे की कार्रवाई से ही तय होगा कि जिम्मेदारी किसकी बनती है।