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उत्तर प्रदेश उपचुनाव: फूलपुर में फूल खिलने से रोक पाएगा हाथ, सपा-कांग्रेस के बीच बन गई बात!

उत्तर प्रदेश में हो रहे इन उपचुनावों के जरिए बीजेपी एक बार फिर से यह संदेश देना चाहती है कि वह लोकसभा चुनाव में भले ही पिछड़ गई है लेकिन प्रदेश में उसकी धाक अब भी मौजूद है। वहीं दूसरी तरफ सपा और कांग्रेस मिलकर उपचुनाव में जीत दर्जकर यह साबित करने के प्रयास कर रहे हैं कि लोकसभा चुनाव में प्रदेश में बीजेपी से आगे निकलना उनके लिए तुक्का नहीं था।

अभिषेक सिंह

लखनऊ: उत्तर प्रदेश में 10 विधानसभा सीटों पर होने वाले उपचुनाव को लेकर सियासी माहौल गर्माने लगा है। सीट बंटवारे का फार्मूला बीजेपी में लगभग तय हो चुका है तो सपा-कांग्रेस की बीच अभी मंथन जारी है। सूत्रों की मानें तो कांग्रेस यूपी उपचुनाव में 3 सीटें मांग रही है जबकि सपा उसे एक सीट देने के लिए तैयार है। कहा यह भी जा रहा है कि कांग्रेस को इतने पर ही मना लिया जाएगा। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है फूलपुर सीट कांग्रेस के हिस्से में आने वाली है।

उत्तर प्रदेश में हो रहे इन उपचुनावों के जरिए बीजेपी एक बार फिर से यह संदेश देना चाहती है कि वह लोकसभा चुनाव में भले ही पिछड़ गई है लेकिन प्रदेश में उसकी धाक अब भी मौजूद है। वहीं दूसरी तरफ सपा और कांग्रेस मिलकर उपचुनाव में जीत दर्जकर यह साबित करने के प्रयास कर रहे हैं कि लोकसभा चुनाव में प्रदेश में बीजेपी से आगे निकलना उनके लिए तुक्का नहीं था।

फूलपुर सीट बीजेपी विधायक प्रवीण पटेल के सांसद बनने के बाद खाली हुई है। प्रवीण पटेल ने यहां अपने सपा के उम्मीदवार को अमर नाथ सिंह मौर्य को 4,332 वोटों से हराया है। इसके अलावा 2017 और 2019 में प्रवीण पटेल ने यहां से विधायक रह चुके हैं।

बात करें फूलपुर सीट की तो यहां 2017 से पहले इस विधानसभा सीट पर बीजेपी कब्जा नहीं जमा सकी थी। 2017 में पहली बार फूलपुर को बीजेपी का विधायक मिला। हालांकि इसकी नींव  2014 के लोकसभा चुनाव में डाली गई थी। तब फूलपुर लोकसभा सीट पर पहली बार केशव प्रसाद मौर्या ने कमल खिलाया था। इसके बाद यहां बीजेपी का दबदबा बढ़ता चला गया।

क्या कहते हैं जातीय समीकरण

वहीं, जिक्र जातीय समीकरण का किया जाए तो इस सीट पर कुर्मी वोटर्स निर्णायक भूमिका में रहते हैं। माना जाता है कि यहां पटेल वोटर जिस तरफ रुख कर देता है उसकी विजय तय हो जाती है। इस लिहाज से देखा जाए तो फूलपुर में कांग्रेस की राह आसान नहीं होगी।

दूसरी तरफ लोकसभा चुनाव में प्रवीण पटेल की जीत का कम अंतर इस तरफ साफ इशारा कर रहा है कि पटेलों ने पूरी तरह से बीजेपी को समर्थन नहीं दिया है। यही वजह है कि कांग्रेस को यहां जीत की आस दिखाई दे रही है। हालांकि उसे कड़ी मेहनत करनी पड़ेगी। जबकि बीजेपी भी यहां अपना दबदबा बरकरार रखना चाहेगी। ऐसे में देखना दिलचस्प होगा कि यहां कमल खिलेगा या फिर हाथ के ठाठ होंगे?

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