

Sunita Narain on Climate Change: नेपाल के भोटे कोसी नदी में भीषण बाढ़ से अब तक करीब 1,150 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 4,500 से अधिक लोग अभी भी लापता हैं। नेपाल में आई इस त्रास्दी ने पूरी दुनिया का ध्यान एक बार फिर जलवायु संकट और इससे होने वाली प्राकृतिक आपदाओं की ओर खींचा है।
इसी बीच सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) की महानिदेशक और पद्मश्री से सम्मानित प्रसिद्ध पर्यावरणविद सुनीता नारायण का एक बयान सामने आया है। उन्होंने कहा कि अब जलवायु परिवर्तन से इनकार करना वास्तविकता से मुंह मोड़ने जैसा है। उन्होंने हिमालयी क्षेत्रों में लगातार हो रहे निर्माण कार्यों और हाइड्रोपावर परियोजनाओं पर सवाल उठाए।
नई दिल्ली में बुधवार (2 सितंबर) को इंडिया हैबिटेट सेंटर में 8वें इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस ऑन सस्टेनेबिलिटी एजुकेशन (ICSE) 2026 की शुरुआत हुई। सम्मेलन में पर्यावरण, जलवायु, शिक्षा, उद्योग और युवाओं से जुड़े विशेषज्ञों ने इस बात पर जोर दिया कि अब पर्यावरण शिक्षा को सिर्फ किताबों और जागरूकता अभियानों तक सीमित रखने का समय नहीं है।
सुनीता नारायण ने नेपाल त्रासदी का जिक्र करते हुए कहा कि अब इससे मुंह नहीं मोड़ा जा सकता है, क्योंकि ऐसा करना सच्चाई से मुंह मोड़ने जैसा होगा। उन्होंने पहाड़ों में लगातार बढ़ रहे निर्माण कार्यों पर भी सवाल उठाए। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि इंसान को इस भ्रम से बाहर निकलना होगा कि वह नदियों और पहाड़ों को अपनी सुविधा के हिसाब से फिर से बना सकते हैं।
पर्यावरणविद् सुनीता नारायण ने कहा कि भारत में मौसम से जुड़ी घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। उन्होंने कहा कि प्रकृति अब हमें साफ संदेश दे रही है बस, अब बहुत हुआ। दिल्ली में यमुना नदी की स्थिति का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि दिल्ली में प्रवेश के समय यमुना के पानी में घुली ऑक्सीजन का स्तर करीब 6 रहता है, लेकिन ISBT तक पहुंचते-पहुंचते यह शून्य हो जाता है। उन्होंने कहा, यमुना मर चुकी है, बस उसका अंतिम संस्कार होना बाकी है।
सुनीता नारायण ने स्पष्ट किया कि यह कोई भावनात्मक बयान नहीं, बल्कि विज्ञान और आंकड़ों पर आधारित तथ्य है। उन्होंने कहा कि दिल्ली का प्रदूषण सिर्फ इलेक्ट्रिक वाहनों की संख्या बढ़ाने से खत्म नहीं होगा। इसके लिए ऐसी मजबूत सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था विकसित करनी होगी, जिससे लोगों को अपनी कार पर निर्भर रहने की जरूरत ही न पड़े।