इलाहाबाद हाईकोर्ट (सोर्स: सोशल मीडिया)
प्रयागराज

48 साल पुरानी बर्खास्तगी पर रेलवे को इलाहाबाद हाईकोर्ट का झटका, कर्मचारी की बहाली का आदेश बरकरार

Allahabad High Court Verdict: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि कैजुअल या दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों को भी औद्योगिक कानून का संरक्षण मिलेगा और केवल देरी से उनके अधिकार खत्म नहीं होंगे।

ओमप्रकाश सिंह परिहार, नमिता प्रजापति

Highlights:

  • 28 फरवरी 1978 को मौखिक रूप से समाप्त की गई थी सेवाएं

  • कर्मचारी ने 240 दिन से अधिक काम करने का दिया था तर्क

  • रेलवे ने 8 साल की देरी और 240 दिन की सेवा पूरी न होने की दलील दी थी

Railway Employee Reinstatement: भारतीय रेलवे में कैजुअल लेबरर के रूप में काम करने वाले एक कर्मचारी को करीब 48 साल पुराने सेवा विवाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट से राहत मिली है। न्यायमूर्ति इरशाद अली की एकल पीठ ने रेलवे प्रशासन की ओर से दाखिल रिट याचिका खारिज करते हुए केंद्रीय सरकार औद्योगिक न्यायाधिकरण-सह-श्रम न्यायालय, कानपुर के उस पंचाट को बरकरार रखा है, जिसमें कर्मचारी को सेवा में वापस लेने का आदेश दिया गया था।

अदालत ने माना कि निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन किए बिना किसी कर्मचारी की सेवाएं समाप्त नहीं की जा सकतीं। दाखिल याचिका के अनुसार, कर्मचारी नसरुद्दीन को रेलवे में सात दिसंबर 1975 को कैजुअल लेबरर के रूप में नियुक्त किया गया था। वह अलग-अलग कार्यों के लिए जारी आदेशों के तहत बीच-बीच में काम करता रहा।

27 फरवरी 1978 तक उसने रेलवे में काम किया। इसके बाद 28 फरवरी 1978 को उसकी सेवाएं मौखिक रूप से समाप्त कर दी गईं। कर्मचारी ने इस कार्रवाई को चुनौती देते हुए श्रम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था। श्रम न्यायालय ने उसकी सेवा समाप्ति को अवैध मानते हुए बहाली का आदेश दिया था। रेलवे ने इसी पंचाट को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

240 दिन की सेवा पूरी करने का कर्मचारी ने दिया था तर्क

रेलवे प्रशासन की ओर से दलील दी गई कि कर्मचारी ने किसी कैलेंडर वर्ष में 240 दिन की निरंतर सेवा पूरी नहीं की थी। इसलिए उसे औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 25-एफ के तहत संरक्षण नहीं मिल सकता। रेलवे का यह भी कहना था कि उसे विशेष कार्यों के लिए सीमित अवधि में रखा गया था और काम पूरा होने पर उसकी सेवाएं समाप्त हो गई थीं। इसके अलावा विवाद उठाने में करीब आठ साल की देरी का तर्क भी दिया गया।

वहीं, कर्मचारी की ओर से कहा गया कि उसने 22 दिसंबर 1975 से 21 दिसंबर 1976 के बीच 240 दिन से अधिक काम किया था। श्रम न्यायालय में रेलवे के गवाह ने भी इस तथ्य को स्वीकार किया था। इसके बावजूद न तो पूर्व सूचना दी गई और न ही वैधानिक छंटनी मुआवजे का भुगतान किया गया।

देरी के आधार पर कर्मचारी का अधिकार समाप्त नहीं होगा

हाईकोर्ट ने पाया कि रेलवे यह साबित नहीं कर सका कि नियुक्ति निश्चित अवधि के अनुबंध के तहत हुई थी और मामला अधिनियम की धारा 2 के अपवाद में आता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल कैजुअल या दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी होने से किसी श्रमिक को औद्योगिक कानून के संरक्षण से वंचित नहीं किया जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि औद्योगिक विवाद में केवल देरी के आधार पर कर्मचारी के अधिकार समाप्त नहीं किए जा सकते। इसके लिए नियोक्ता को यह दिखाना होगा कि देरी से उसे वास्तविक नुकसान हुआ है। हाईकोर्ट ने श्रम न्यायालय के निष्कर्षों में कोई कानूनी त्रुटि नहीं पाई और रेलवे की याचिका खारिज कर दी। इससे कर्मचारी के पक्ष में पारित बहाली का पंचाट बरकरार रहा।

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