कभी सपा में मुलायम सिंह यादव के बाद दूसरे बड़े नेताओं में गिने जाते थे आजम खान
आजम खान के खिलाफ कई आपराधिक मामले और गंभीर आरोप हैं लंबित
अधिकारियों के साथ विवादित बयानों और व्यवहार को लेकर भी चर्चा में रहे आजम खान
Samajwadi Party Azam Khan: आजम खान को अब बेसब्री से 16 नवंबर का इंतजार है। सुप्रीम कोर्ट से जमानत की गुहार पर कुछ ठोस न होने से उनकी बैचेनी और बढ़ गई है। इस बैचेनी को उनके मुसलमान होने से जोड़ कर देखा जा रहा है। लगभग ग्यारह महीने बाद दो पेनकार्ड मामले में रामपुर जेल से बाहर आने और वहीं से ईडी द्वारा द्वारा धर लिए जाने के बाद आजम खान ने बहुत कारुणिक अंदाज में अपना दर्द बखान किया था।
उन्होंने कहा था कि उन्हें मुसलमान होने की सजा मिल रही है।मीडिया के सवालों के जवाब में उन्होंने कहा, “क्या कहें? अब कहने के लिए रहा ही क्या है? मुसलमान होने की सजा है। गलती यह है कि मैंने यूनिवर्सिटी बनाई, यूनिवर्सिटी बनाई एक मुसलमान ने ये है गुनाह हमारा। बच्चों के स्कूल बनाए एक मुसलमान ने ये है गुनाह हमारा।”
समाजवादी पार्टी के कद्दावर नेता आजम खान 2025 नवंबर से रामपुर जेल में बंद थे। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 29 अक्टूबर को उनकी सजा पर रोक लगा दी और अब्दुल्ला के चुनाव लड़ने के लिए दो पेन कार्ड रखने के मामले में उन्हें जमानत दे दी। इस मामले में आजम खान के साथ उनके बेटे और पूर्व विधायक अब्दुल्ला आजम भी शामिल थे।
अब्दुल्ला तो जमानत पर बाहर आ गए लेकिन रामपुर जेल से बाहर निकलते ही आजम को जौहर यूनिवर्सिटी से जुड़े मनी लांड्रिंग के आरोप में फिर गिरफ्तार कर लिया गया। इस पर आजम ने बहुत आहत होकर अपनी गिरफ्तारी को मुसलमान होने की सजा बताया।
बीजेपी और समाजवादी पार्टी की प्रतिद्वंदिता और राज्य की भाजपा सरकार पर विपक्ष द्वारा लगातार मुस्लिम विरोधी होने के आरोपों के बीच आजम की यह पीड़ा भावनात्मक रूप से बहुत लोगों को भीतर तक नम कर गई। अतीक अहमद, मुख्तार अंसारी जैसे बड़े राजनीतिक माफियाओं के खात्मे के बाद आजम खान के इस बयान के भावनात्मक रूप से गहरे मायने हैं। प्रदेश के चुनावी माहौल में इस तरह की रुआंसी पीड़ा वोटर का मन बदलने का काम बहुत आसानी से कर सकती है। हालांकि समाजवादी पार्टी ने अभी से बड़ा मुद्दा नहीं बनाया है फिर भी यह समझना जरूरी है कि क्या आजम खान को वाकई उनके मुसलमान होने की सजा मिल रही है।
उत्तर प्रदेश में सत्ता से बाहर होने के बाद समाजवादी नेता आज़म खान पर विभिन्न आपराधिक मामलों के तहत 80 से अधिक मुकदमे अभी चल रहे हैं जिनमें से कुछ गंभीर मामले हैं तो बहुत से चुनाव आचार संहिता और चुनाव से जुड़े अन्य मामले। जिस मामले में आजम रामपुर जेल से बाहर आए थे वो भी कोई सामान्य आरोप नहीं राजनीतिक लाभ के लिए फर्जी दस्तावेज बनाने का मामला था और जिस आरोप में प्रवर्तन निदेशालय ने उन्हें घेरा है वह भी बड़े आर्थिक अपराध का मामला है।
विभिन्न सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक आजम के खिलाफ 2017 से अब तक कुल 95 मामले दर्ज हैं। कुछ मामलों में उन्हें 2 वर्ष से अधिक की सजा भी हो चुकी है और कई मामलों में भी भारी भी हो चुके हैं वर्तमान में उनके खिलाफ 50 से अधिक मुकदमे विभिन्न स्तर पर चल रहे हैं।
रामपुर में जिस मुकदमे में वे बाहर छूटे थे वह भी बड़ा मामला था और जिस मनी लांड्रिंग के आरोप में उन्हें फिर गिरफ्तार किया वह भी कोई सामान्य आपराधिक आरोप नहीं है। प्रवर्तन निदेशालय के अनुसार वह जौहर यूनिवर्सिटी के करोड़ों रुपयों के फंड डायवर्जन से जुड़ा मामला है। आजम के खिलाफ चल रहे मामलों में अधिकारियों को धमकाने डराने, घर से जेवर और भैंस तथा बकरी चुराने, मदरसे की लाइब्रेरी से हजारों दुर्लभ किताबों को जौहर यूनिवर्सिटी पहुंचाने, बेटे अब्दुल्ला के लिए दो-दो जन्म प्रमाण पत्र बनवाने, यूनिवर्सिटी के लिए लोगों के घर उजाड़ने, जबरन जमीन हथियाने और भड़काऊ चुनाव बयानों से जुड़े मामले भी शामिल हैं।
उनके बेटे और पत्नी को भी आपराधिक मामलों में अदालतों से सजा मिल चुकी हैं। रामपुर में उनके खिलाफ अनेक मामलों में शिकायतकर्ता रामपुर के ही स्थानीय मुस्लिम नागरिक रहे हैं। ऐसे में आजम का मीडिया से यह कहना कि उन्हें मुसलमान होने की सजा मिल रही है, उनके खिलाफ चल रहे अपराधिक मुकदमों की संख्या और गंभीरता को देखते हुए सही नहीं ठहरता।
आजम खान अब न्याय की गुहार लगा रहे हैं। जिन्होंने उनका जलवा देखा है उनसे आजम की मिमियाहट देखी नहीं जा रही है। एक दौर ऐसा भी था कि जब आजम खान मुलायम सिंह यादव के बाद समाजवादी पार्टी की राजनीति में दूसरे नंबर के नेता माने जाते थे। वे सुबह को शाम कह देते और शाम को सुबह तो सामने वाले को उसे मानना ही होता था। वे मुख्यमंत्री से नाराज हो जाते तो कैबिनेट की बैठकों में जाना छोड़ देते और फिर मुलायम सिंह यादव को उनके पास आकर उन्हें मनाना पड़ता था।
उनकी हनक ऐसी थी कि वो किसी भी अधिकारी को सरेआम धमका सकते थे। अफसरों से जूते साफ करवाने जैसी बातें कहने वाले आजम खान ने 9 अप्रैल 2019 को लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान रामपुर के मनकरा गांव में एक सभा में रामपुर के उस समय के डीएम और अन्य प्रशासनिक अधिकारियों पर ताना कसते हुए उनको 'तनखैया' तक कह दिया था।आजम ने कहा था कि ये सब सरकारी वेतन पर काम करने वाले कर्मचारी हैं और जनता को इन 'तनखैयों' से डरने की जरूरत नहीं है। उन्होंने अधिकारियों को लेकर आपत्तिजनक भाषा का भी इस्तेमाल किया था।
इस भड़काऊ और विवादित भाषण के कारण उन पर आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन और सरकारी अधिकारियों के खिलाफ टिप्पणी के मामले में मुकदमा हुआ था। एमपी/एमएलए कोर्ट ने उन्हें दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई थी। आजम को एक बड़ा झटका सुप्रीम कोर्ट से तत्काल राहत न मिल पाने से भी लगा है।
देश की सबसे बड़ी अदालत ने उन्हें फिलहाल कोई राहत देने से इनकार कर दिया और हाई कोर्ट का रास्ता दिखा दिया। आजम अब 16 नवंबर को हाईकोर्ट की कार्यवाही का इंतजार तो कर रहे हैं। लेकिन इसके साथ आजम यह भी कह रहे हैं कि "वे मुझे चुनाव तक सलाखों के पीछे रखना चाहते हैं, ऐसे में तो मैं जेल में ही मर जाऊंगा।"