अखिलेश का अयोध्या दौरा, सपा की छवि बदलने की कोशिश
भाजपा राम मंदिर के नैरेटिव को मजबूत करने में जुट सकती है
हिंदू मतदाताओं को लेकर सपा-BJP में सियासी संदेश की जंग
BJP Ram Mandir Narrative: उत्तर प्रदेश की सियासत में राम मंदिर एक बार फिर राजनीतिक चर्चा के केंद्र में है। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव का 12 दिसंबर को प्रस्तावित अयोध्या दौरा केवल धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि इसके गहरे सियासी मायने भी निकाले जा रहे हैं।
रामलला के दर्शन और हनुमानगढ़ी में पूजन के इस कार्यक्रम को भाजपा के उस नैरेटिव के जवाब के तौर पर देखा जा रहा है, जिसमें सपा पर राम मंदिर और हिंदू आस्था से दूरी बनाने के आरोप लगते रहे हैं।
हालांकि, इस दौरे का एक दूसरा पहलू भी है, जो अखिलेश की चुनावी रणनीति को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।
भाजपा लंबे समय से राम मंदिर को अपनी वैचारिक और राजनीतिक उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत करती रही है। ऐसे में अखिलेश का अयोध्या पहुंचना भाजपा के उस एकाधिकार वाले राजनीतिक विमर्श को चुनौती देने की कोशिश हो सकता है।
सपा यह संदेश देना चाहेगी कि राम और धार्मिक आस्था किसी एक राजनीतिक दल की विरासत नहीं हैं। इसके जरिए अखिलेश अपने ऊपर लगने वाले हिंदू विरोधी होने के आरोपों की धार भी कमजोर करना चाहेंगे।
अखिलेश की रणनीति को केवल भाजपा के दबाव में उठाया गया कदम मानना भी जल्दबाजी होगी। संभव है कि सपा नेतृत्व अपने परंपरागत यादव-मुस्लिम मतों को लेकर पहले से आश्वस्त हो। मुस्लिम मतों के बीच असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी की मौजूदगी के बावजूद सपा को अपने जनाधार में बड़ी सेंधमारी का खतरा फिलहाल उतना प्रभावी न दिख रहा हो। ऐसे में पार्टी की नजर अब अपने परंपरागत आधार से आगे बढ़कर गैर-यादव हिंदू जातियों के मतदाताओं तक पहुंच बनाने पर हो सकती है।
यदि अखिलेश यादव अपने मूल वोट बैंक को बनाए रखते हुए ब्राह्मण, अन्य पिछड़ी जातियों और दूसरे हिंदू सामाजिक समूहों में स्वीकार्यता बढ़ाने में सफल होते हैं, तो सपा के कुल मत प्रतिशत में उल्लेखनीय इजाफा हो सकता है। हालिया विधान परिषद चुनाव के नतीजों ने भी संकेत दिया है कि प्रदेश की राजनीति में जातीय और सामाजिक समीकरणों को एकतरफा मानकर नहीं चला जा सकता।
वहीं दूसरी तरफ भाजपा के पास भी अखिलेश यादव के इस कदम को राजनीतिक विमर्श में अपने पक्ष में इस्तेमाल करने का अवसर होगा। पार्टी इसे अपनी वैचारिक राजनीति और राम मंदिर आंदोलन से जुड़े जनसमर्थन के प्रभाव के रूप में प्रस्तुत कर सकती है। ऐसे में अयोध्या का यह दौरा दोनों दलों के लिए सियासी संदेश देने का मंच बन सकता है।
फिलहाल सवाल है कि अखिलेश का यह कदम केवल छवि बदलने की कवायद साबित होगा या वास्तव में उनके सामाजिक समीकरण का विस्तार करेगा। भाजपा अपने राम मंदिर के नैरेटिव को कितना मजबूत रख पाती है और सपा हिंदू मतदाताओं के बीच कितनी स्वीकार्यता हासिल करती है, इसका जवाब आने वाले समय में मिलेगा। फिलहाल दोनों दल अपने-अपने सियासी दांव चल रहे हैं, लेकिन इन दांवों का चुनावी परिणाम क्या होगा, यह वक्त और मतदाता तय करेंगे।