Agra Haisiyat Certificate Fraud: सरकारी टेंडर और अन्य कार्यों में उपयोग होने वाले हैसियत प्रमाणपत्रों को लेकर आगरा में लगातार सवाल उठ रहे हैं। एक मामले में फर्जी हैसियत प्रमाणपत्र तैयार कराने का आरोप लगाते हुए शिकायत के बाद जिलाधिकारी ने जांच के निर्देश दिए थे, लेकिन शिकायतकर्ता का दावा है कि आठ दिन बाद भी जांच आगे नहीं बढ़ी है। इसी बीच एक और आवेदक का हैसियत प्रमाणपत्र तैयार किए जाने की प्रक्रिया में दस्तावेजों और राजस्व रिपोर्ट को लेकर सवाल खड़े किए गए हैं।
हिंदू महासभा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष अज्जू चौहान ने सोमवार 11 सितंबर को जिलाधिकारी के समक्ष एक हैसियत प्रमाणपत्र को लेकर शिकायत रखी थी। उनका आरोप था कि प्रमाणपत्र के लिए प्रस्तुत संपत्ति संबंधी विवरण में गड़बड़ी की गई है। मामले को गंभीरता से लेते हुए जिलाधिकारी स्तर से जांच के निर्देश दिए गए थे। शिकायतकर्ता के अनुसार जांच अपर जिलाधिकारी वित्त एवं राजस्व को सौंपी गई, लेकिन बाद में प्रकरण की जांच एसडीएम सदर तहसील को भेज दी गई।
अज्जू चौहान का आरोप है कि जिस अधिकारी के अधीनस्थ स्तर की रिपोर्ट और प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं, उसी तहसील स्तर पर जांच सौंपे जाने से निष्पक्ष जांच को लेकर सवाल खड़े होते हैं। उन्होंने इस मामले में आवेदक कमल स्वरूप, क्षेत्रीय लेखपाल रजनी शाक्य और जन सुविधा केंद्र संचालक भानु प्रताप की भूमिका की जांच की मांग की है। आरोप यह भी है कि जन सुविधा केंद्र संचालक तहसील परिसर में एक अधिवक्ता की सीट पर बैठकर काम करता है।
शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया है कि पूरे प्रकरण में एसडीएम सदर तहसील की रिपोर्ट भी लगी हुई है। ऐसे में जांच उसी स्तर पर दिए जाने को लेकर उन्होंने स्वतंत्र कमेटी गठित करने की मांग उठाई है। उनका कहना है कि यदि मामले की निष्पक्ष जांच नहीं हुई तो आंदोलन को आगे बढ़ाया जाएगा।
इसी बीच एक और मामला सामने आया है। पंडित मनीष कुमार शर्मा ने आरोप लगाया है कि शाहगंज निवासी विशाल शर्मा के नाम से हैसियत प्रमाणपत्र बनवाने के लिए चार संपत्तियों का विवरण प्रस्तुत किया गया है। उनका दावा है कि सदर तहसील के रिकॉर्ड के अनुसार इन चारों संपत्तियों से संबंधित लेखपाल और राजस्व निरीक्षक अलग-अलग हैं, लेकिन प्रस्तुत दस्तावेजों में सभी संबंधित लेखपालों की रिपोर्ट दिखाई नहीं दे रही है।
आरोप के मुताबिक दस्तावेजों में केवल एक राजस्व निरीक्षक की रिपोर्ट लगी है, जिनका नाम देवेंद्र उपाध्याय बताया गया है। इसके बाद तहसीलदार सदर, सब रजिस्ट्रार सदर और एसडीएम सदर की रिपोर्ट भी दर्ज होने का दावा किया गया है।
मनीष कुमार शर्मा ने इस प्रक्रिया में राजस्व निरीक्षक देवेंद्र उपाध्याय और एसडीएम सदर के स्टेनो गिरीश महामना पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने आरोप लगाया है कि सक्षम अधिकारियों के फर्जी हस्ताक्षर कराने का काम किया जाता है। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और संबंधित अधिकारियों/कर्मचारियों का पक्ष सामने आना बाकी है।
हैसियत प्रमाणपत्र जिलाधिकारी अथवा अधिकृत सक्षम अधिकारी की प्रक्रिया से जारी होते हैं और उत्तर प्रदेश सरकार की जनहित सेवाओं में इसके लिए निर्धारित प्रक्रिया एवं समय-सीमा भी दर्ज है। ऐसे में प्रमाणपत्र तैयार करने की प्रक्रिया में संपत्तियों के सत्यापन, राजस्व रिपोर्ट और अधिकारियों के हस्ताक्षरों की प्रामाणिकता महत्वपूर्ण हो जाती है।
अब सवाल केवल एक प्रमाणपत्र का नहीं, बल्कि यह है कि यदि एक ही तहसील में लगातार ऐसे आरोप सामने आ रहे हैं तो संपत्ति सत्यापन से लेकर अंतिम रिपोर्ट तक पूरी प्रक्रिया की स्वतंत्र जांच क्यों न कराई जाए? शिकायतकर्ताओं की मांग है कि संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों से अलग किसी उच्चस्तरीय कमेटी से जांच कराई जाए, ताकि आरोपों की निष्पक्षता से पुष्टि या खंडन हो सके।
फिलहाल दोनों मामलों में लगाए गए आरोप जांच का विषय हैं। प्रशासन की जांच रिपोर्ट के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि दस्तावेजों में वास्तव में अनियमितता हुई है या नहीं और यदि हुई है तो इसके लिए कौन जिम्मेदार है।