

Agra Fake Solvency Certificate Scam: सरकारी निर्माण कार्यों के बड़े-बड़े टेंडर हासिल करने के लिए हैसियत यानी सॉल्वेंसी प्रमाणपत्र के कथित फर्जीवाड़े का मामला आगरा में एक बार फिर चर्चा में है। आगरा विकास प्राधिकरण (एडीए) में कूटरचित दस्तावेज के सहारे सरकारी टेंडर हासिल करने के चर्चित मामले में महिला ठेकेदार सरिता मिश्रा और उनकी फर्म के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराने के आदेश के बाद अब फर्जी हैसियत प्रमाणपत्रों के कथित नेटवर्क को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं।
एडीए के मामले में भाजपा के वरिष्ठ नेता नागेंद्र दुबे गामा की शिकायत के बाद प्रकरण सामने आया था। गामा ने प्राधिकरण में साक्ष्यों के साथ शिकायत करते हुए आरोप लगाया था कि निर्माण कार्यों के टेंडर हासिल करने के उद्देश्य से डीएम कार्यालय के नाम से तैयार फर्जी हैसियत प्रमाणपत्र का इस्तेमाल किया गया। प्रारंभिक जांच में गड़बड़ी सामने आने के बाद एडीए के मुख्य अभियंता संजय कुमार ने संबंधित फर्म को तीन साल के लिए ब्लैकलिस्ट कर दिया था।
हालांकि, शिकायतकर्ता ने इसे पर्याप्त कार्रवाई नहीं मानते हुए कानूनी कार्रवाई की मांग की। इसके बाद एडीए उपाध्यक्ष एम. अरुन्मोली ने महिला ठेकेदार और उनकी फर्म के खिलाफ धोखाधड़ी, फर्जी दस्तावेज तैयार करने तथा सरकारी तंत्र को गुमराह करने के आरोपों में प्राथमिकी दर्ज कराने के आदेश दिए। साथ ही फर्म द्वारा पूर्व में हासिल किए गए टेंडरों की भी जांच के निर्देश दिए गए हैं।
इसी बीच नवभारत टीम के सामने हैसियत प्रमाणपत्र से जुड़ा एक और मामला आया है। आरोप है कि करीब 35 लाख रुपये की सॉल्वेंसी को कथित तौर पर हेरफेर कर 55 से 60 लाख रुपये के आसपास दर्शाया गया। इस मामले में शुक्रवार को जिलाधिकारी मनीष बंसल से शिकायत की गई, जबकि सोमवार को अपर जिलाधिकारी वित्त एवं राजस्व के समक्ष भी प्रकरण रखा गया और जांच कर कड़ी कार्रवाई की मांग की गई है।
हिंदू महासभा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष अज्जू चौहान ने आरोप लगाया कि आगरा में फर्जी अथवा बढ़ा-चढ़ाकर हैसियत प्रमाणपत्र तैयार कराने वाला एक व्यापक नेटवर्क सक्रिय है। उनके मुताबिक यह केवल एक-दो लोगों तक सीमित मामला नहीं है, बल्कि इसमें कई लोगों की भूमिका होने की आशंका है। आरोप है कि ऐसे प्रमाणपत्रों के आधार पर सरकारी विभागों में बड़े निर्माण कार्यों के टेंडर हासिल किए जाते हैं।
अज्जू चौहान का कहना है कि यदि किसी व्यक्ति की वास्तविक वित्तीय क्षमता कम है और दस्तावेजों में उसे बढ़ाकर प्रस्तुत किया जाता है, तो इससे उन ठेकेदारों के हित प्रभावित होते हैं जो वास्तविक हैसियत और वैध दस्तावेजों के साथ निविदा प्रक्रिया में शामिल होते हैं। उन्होंने कहा कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और यह पता लगाया जाना चाहिए कि ऐसे प्रमाणपत्र तैयार कराने, सत्यापित कराने और उनका इस्तेमाल करने में कौन-कौन लोग शामिल हैं।
उन्होंने दावा किया कि इस पूरे मामले से जुड़े दस्तावेज नवभारत टीम को भी उपलब्ध कराए गए हैं। उनका कहना है कि वह इस कथित नेटवर्क के खिलाफ आगे भी आवाज उठाएंगे और जरूरत पड़ी तो आंदोलन का रास्ता अपनाया जाएगा।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या हैसियत प्रमाणपत्र में कथित हेरफेर केवल अलग-अलग मामलों तक सीमित है या इसके पीछे वास्तव में कोई संगठित नेटवर्क काम कर रहा है? क्या ऐसे प्रमाणपत्रों के आधार पर पहले भी सरकारी विभागों से बड़े टेंडर हासिल किए गए हैं? और यदि ऐसा हुआ है तो उन पुराने टेंडरों की जांच कब होगी?
एडीए के मामले में प्राथमिकी और पुराने टेंडरों की जांच के आदेश के बाद प्रशासन के सामने अब चुनौती और बड़ी हो गई है। यदि शिकायत में लगाए गए आरोप जांच में सही पाए जाते हैं तो यह सिर्फ एक ठेकेदार या एक प्रमाणपत्र का मामला नहीं रहेगा, बल्कि सरकारी टेंडर प्रक्रिया की पारदर्शिता और निगरानी व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े होंगे। अब निगाह आगरा प्रशासन की जांच और आगे होने वाली कार्रवाई पर है।