Weak Monsoon Crop Impact: देश के 111 जिले में तो स्थिति बहुत ही खराब है। मौसम विभाग के पूर्वानुमान के मुताबिक अभी तक 2 जुलाई तक मानसून के कमजोर रहने की आशंका है, इसके बाद बेहतर होने की उम्मीद है। अगर बारिश न हुई तो बोई हुई फसलों का नुकसान होगा व किसानों को आर्थिक चपत भी लग सकती है। खरीफ फसलों की बुआई मुख्यतः जून मध्य से जुलाई पहले सप्ताह तक हो जाती है। लेकिन इस साल जून के आखिरी हफ्ते में अभी तक महज 10 फीसदी क्षेत्र में ही बुआई हुई है।
खरीफ की फसलों में धान, मक्का, बाजरा, ज्वार, कपास, सोयाबीन, अरहर और मूंगफली आती हैं। देश की आधी से ज्यादा कृषि भूमि आज भी सिंचाई की सुविधाओं से वंचित है, यह सीधे मानसून की वर्षा पर ही आधारित है। कृषि मंत्रालय के मुताबिक जून 2026 के मध्य तक खरीफ बुआई का क्षेत्र पिछले साल की तुलना में कम तो मामूली ही रहा, लेकिन कुछ फसलें बुआई से जबर्दस्त पिछड़ गई हैं, जिनमें कपास, सोयाबीन और दलहन विशेष रूप से हैं। क्योंकि बारिश कम हुई है तो जमीन में पर्याप्त नमी नहीं है। अगर जमीन में नमी कम होती है तो बीज अंकुरित नहीं होते।
बेहद गर्म मिट्टी में हफ्तों पड़े रहने के बाद कई बीज अंकुरण की अपनी क्षमता खो देते हैं। ज्वार, बाजरा और मक्के के लायक तो बारिश फिर भी हुई है या आगे हो सकती है। लेकिन जिस तरह का अभी तक सूखा दिख रहा है, वह वैसा ही अगर जारी रहा, तो इस साल धान की फसल को गहरा धक्का लगेगा। जानकारों को उम्मीद है कि अगर जुलाई में अच्छी बारिश हो जाए तो जून के नुकसान की भरपायी न भी हो तो घाटा कम हो सकता है।
लेकिन जुलाई भी कमजोर रहा और अगस्त की शुरुआत भी कमजोर रही, तब तो भगवान ही मालिक है। अगर जुलाई का पहला पखवाड़ा बेहद कमजोर बारिश का रहा तो धान, कपास, सोयाबीन, मूंगफली और अरहर की फसलों पर जबर्दस्त संकट मंडराता दिखेगा। खाद्यान्न उत्पादन में तो 3 से 8 फीसदी तक की ही गिरावट का अनुमान है। सबसे बड़ा असर किसानों पर ही पड़ेगा।
क्योंकि एक तरफ तो उनकी फसल कम होगी, दूसरी तरफ बुआई के नुकसान के कारण अच्छा-खासा आर्थिक नुकसान भी होगा। इसलिए ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर इस साल का मानसून भारी दबाव बनाता दिख रहा है। सरकार पर इसका असर इसलिए भी भारी पड़ सकता है, क्योंकि करीब 80 करोड़ लोगों को खाद्य सुरक्षा के तहत जो मुफ्त का राशन दिया जा रहा है, उससे देश की जीडीपी किसी हद तक कम हो सकती है।
दालों, खाद्य तेलों, सब्जियों और पशुओं के लिए चारा पर बढ़ी कीमतें किसान का बजट बिगाड़ रही हैं। सरकार कई आपातकालीन योजनाएं लागू कर रही हैं। मसलन वह लगातार किसानों को प्रोत्साहित कर रही है कि कम अवधि वाली और कम पानी लेने वाली फसलें बोएं, इसके अलावा सरकार लगातार जल संरक्षण, तालाबों और चेक डैमों की मरम्मत, साथ ही वैकल्पिक बीज उत्पादन जैसी संकट से निपटने की योजनाओं को लागू कर रही है।
लेकिन कोई नहीं जानता कि आने वाले 20 से 22 दिन कैसे होंगे? अगर निर्धारित मात्रा की 80 फीसदी तक भी बारिश हो जाती है तो संकट काफी हद तक काबू में रहेगा। लेकिन यदि 50 फीसदी तक ही बारिश होती है, तो देश के 315 जिलों में आपातकालीन स्थितियों का सहारा लेना पड़ेगा।
हालांकि तात्कालिक रूप से खाद्यन्न की समस्या नहीं होगी, लेकिन बाकी चीजों में जो महंगाई बढ़ेगी, वह आम और मध्यवर्ग को तोड़कर रख देगी। किसानों से लेकर सरकार और वैज्ञानिकों तक की नजरें बादलों पर टिकी हैं।
जून लगभग खत्म होने को है। लेकिन अभी तक मानसूनी बारिश महज 42 से 43 फीसदी ही हुई है। बारिश अगले एक पखवाड़े तक और न हुई या बेहद कम हुई तो देश के 315 जिलों में कृषि संबंधी आकस्मिक योजनाएं लागू करनी पड़ेंगी।
यह भी पढ़ें:-Navabharat Nishanebaaz: विजय जानना चाहते स्टालिन का पता, उदयनिधि से पूछा-कहां हैं तुम्हारे पिता
कम बारिश से न केवल शहरों के लिए पेय जल का संकट मंडराने लगा है बल्कि खरीफ फसल के भी बेहद कमजोर होने की आशंका पैदा हो गई हैं। इसका नतीजा देश की खाद्यन्न सुरक्षा पर पड़ता लगा रहा है। केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चैहान ने कहा कि मानसून में देरी के कारण खरीफ फसलों की बुआई पर बेहद प्रतिकूल असर पड़ रहा है।
लेख-नरेंद्र शर्मा के द्वारा