SIR Voter List Revision: मतदाता सूची का एसआईआर (विशेष गहन पुनरीक्षण) इसलिए आवश्यक है ताकि दिवंगत, पता बदल चुके लोगों तथा डुप्लीकेट नाम हटाए जा सकें। इन मतदाताओं के साथ नए मतदाताओं के नाम जुड़ जाने से यह लिस्ट बहुत लंबी होती चली जाती है। इतने पर भी मनमाने ढंग से या राजनीतिक दबाव में आकर किसी वैध मतदाता का नाम सूची से हटा देना गलत व असहनीय है। आम आदमी पार्टी छोड़कर बीजेपी में शामिल हुए सांसद राघव चड्डा ने आरोप लगाया कि पंजाब की मतदाता सूची से उनका नाम हटा दिया गया है।
इसी तरह अनेक देशों में भारत के राजदूत रह चुके तथा विदेश सेवा में अन्य पदों पर रहे नवदीप सूरी व रमेश चंदर के नाम एसआईआर के दौरान काट दिए गए, भारतीय वायुसेना में उच्च पद पर रहे शमीम अख्तर की भी यही शिकायत है। एसआईआर मुहिम के दौरान मतदाता सूची से अब तक 13.37 करोड़ नाम हटाए गए हैं। इनमें से कुछ नाम ड्राफ्ट सूची में होने से फिर शामिल किए जा सकते हैं।
2024 के लोकसभा चुनाव के समय देश में 96 करोड़ 88 लाख मतदाता थे। इसके बाद 2 वर्षों में कुछ मतदाता और बढ़े होंगे। एसआईआर में 13.37 करोड़ नाम हटा दिए गए अर्थात 14 प्रतिशत वोटर के नाम पर कैंची चल गई। इनमें महाराष्ट्र के 2 करोंड़ से ज्यादा मतदाता शामिल हैं। एसआईआर मुहिम का पहला चरण जून से सितंबर 2025 तक बिहार में चला। इसके बाद बंगाल में एसआईआर किया गया तब आरोप लगाया गया कि बदले की भावना से नाम हटाए गए।
यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा जिसने चुनाव आयोग को निर्देश दिया कि एसआईआर मुहिम किसी की नागरिकता निर्धारण करने के लिए नहीं है। पहले तो विपक्षी पार्टियों के नेता एसआईआर मुहिम में पक्षपात व अन्याय का आरोप लगा रहे थे। लेकिन अब बीजेपी सांसद राघव चड्डा भी ऐसा आरोप लगाने लगे। उनकी नाराजगी पंजाब में सत्तारूढ़ भगवंत मान के नेतृत्ववाली 'आप' सरकार पर है।
मुंबई के पास पनवेल में 3400 मतदाताओं के गणनापत्र या आवेदन की जेराक्स कॉपी निकालते हुए बीजेपी पदाधिकारी को शिवसेना (उद्धव) के कार्यकर्ताओं ने पकड़ा। बंगाल में टीएमसी का आरोप था कि हमारे मतदाताओं के नाम हटा दिए गए। झारखंड के गोड्डा में 4 बूथों पर चुनाव अधिकारियों व बीजेपी कार्यकताओं के बीच विवाद हो गया। बीजेपी कार्यकर्ताओं ने फार्म 7 का पूरा गट्ठा पेश कर लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाने की मांग की।
ऐसा करना प्रक्रिया के अनुरूप नहीं था क्योंकि चुनाव नियमों के तहत फार्म 7 किसी नाम को जोड़ने या नाम हटाने पर आपत्ति के लिए होता है। थोक में नाम हटाने की मांग करना प्रक्रिया का उल्लंघन है। ऐसे लोगों के नाम भी हटाए गए जिन्होंने आवश्यक दस्तावेज प्रस्तुत किए थे तथा जो एक ही मकान में पीढ़ियों से रहते चले आए हैं या फिर जिनका नाम 2003 की मतदाता सूची में शामिल था। मतदाता सूची में समय-समय पर सुधार कर अद्यतन बनाना चाहिए परंतु यह नागरिकता की जांच नहीं बनना चाहिए।
लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा