

Teachers Day Special: भारत में हर साल 5 सितंबर का दिन बड़े ही धूम-धाम से शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है। देश के पहले पहले उपराष्ट्रपति और दूसरे राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के सम्मान में मनाए जाने वाले इस खास दिवस की शुरुआत 5 सितंबर 1962 से हुई थी। दरअसल, जब 1962 में डॉ. राधाकृष्णन देश के राष्ट्रपति बने, तब उनके कुछ छात्रों ने उनका जन्मदिन मनाने की इच्छा जताई थी।
इस पर उन्होंने कहा था कि उनके जन्मदिन को अलग से मनाने के बजाय यदि इस दिन को शिक्षकों के सम्मान में 'शिक्षक दिवस' के रूप में मनाया जाए, तो उन्हें अधिक गर्व होगा। तब से यह परंपरा हर साल लगातार चली आ रही है।
देश में एक ऐसा भी वक्त था जब किसी गांव या छोटे शहर के छात्र अगर डॉक्टर, इंजीनियर या यूपीएससी जैसी कठिन परीक्षाओं की तैयारी का सपना नहीं देख पाता था। इसमें सबसे बड़ी समस्या बनती थी लाखों रुपये की कोचिंग की फीस और बड़े शहरों में रहने का ज्यादा खर्च। लेकिन पिछले कुछ सालों में देश की शिक्षा व्यवस्था की तस्वीर बदली है। जिसने कोचिंग इंडस्ट्री के स्थापित ढर्रे को बदलकर रख दिया है।
आज इस खास मौके पर हम उन डिजिटल गुरुओं के बारे में बात करने जा रहे हैं, जिन्होंने भारत की शिक्षा में क्रांतिकारी बदलाव लाए। उन्होंने अपने प्रयास और तकनीक का सहारा लेते हुए देश के कोने-कोने तक सस्ती शिक्षा पहुंचाने का काम किया। बिहार के पटना से शुरआत करने वाले खान सर आज किसी खास पहचान के मोहताज नहीं है। वहीं, उत्तर प्रदेश के प्रयागराज के अलख पांडेय ने एक यूट्यूब चैनल के जरिए उन छात्र और छात्राओं तक पहुंचे, जो कभी उच्च शिक्षा के बारे में सोच भी नहीं सकते थे।
इन डिजिटल गुरुओं की प्रयास का नतीजा है कि छोटे कस्बे और गांवों से निकलकर लोग अधिकारी, डॉक्टर और इंजिनियर बन रहे हैं। जहां पारंपरिक कोचिंग संस्थानों में नीट (NEET), जेई (JEE) या सिविल सर्विसेज की तैयारी के लिए 1 लाख से 2.5 लाख रुपये तक की सालाना फीस ली जाती रही है। इसके ऊपर कोटा, दिल्ली या पटना जैसे शहरों में रहने और खाने का खर्च सालाना 1.5 से 2 लाख रुपये अतिरिक्त बैठता था। अब वह बहुत ही कम लागत पर घर बैठे हो जा रहा है।
किफायती फीस मॉडल: अलख पांडेय और खान सर जैसे डिजिटल गुरुओं ने पूरे साल के कोर्स केवल 3,000 से 5,000 रुपये के बजट में उपलब्ध कराए।
भौगोलिक बाधाएं खत्म: छात्रों को अब अपने घर-गांव छोड़कर बड़े शहरों के महंगे कमरों में रहने की मजबूरी नहीं रही।
भाषा का दायरा टूटा: ठेठ देहाती और सरल हिंदी भाषा में जटिल से जटिल वैज्ञानिक और सामाजिक विषयों को समझाना इनकी सबसे बड़ी ताकत बनी।
डिजिटल गुरुओं की इस मुहिम ने देश में शिक्षा के लोकतांत्रीकरण को रफ्तार दी है। हालांकि, स्क्रीन टाइम का बढ़ना, इंटरनेट कनेक्टिविटी का डिजिटल डिवाइड और छात्रों में सेल्फ-डिसिप्लिन बनाए रखना अब भी बड़ी चुनौतियां हैं। इसके बावजूद, यह कहना गलत नहीं होगा कि इन डिजिटल शिक्षकों ने गुरु-शिष्य की परंपरा को 21वीं सदी के भारत के अनुकूल एक नया और सशक्त रूप दे दिया है।