Subhash Chandra Zee Media Loan Controversy: जी-मीडिया समूह के मालिक सुभाष चंद्रा पर 22,006.57 करोड़ रुपये के कर्ज को नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) द्वारा महज 6.25 करोड़ रुपये में समायोजित किए जाने की सुर्खियां मीडिया में छाई हुई हैं। इससे इनकार करते हुए सुभाष चंद्रा ने मुकेश अंबानी पर उन्हें सार्वजनिक रूप से बदनाम करने का न सिर्फ आरोप लगाया है, बल्कि धमकी भी दी है कि अगर उनके स्वामित्व वाले टीवी चैनलों द्वारा उन पर (सुभाष चंद्रा पर) कीचड़ उछालना बंद न किया, तो उनका तो कुछ नहीं बिगड़ेगा, क्योंकि उनके पास अब खोने के लिए कुछ नहीं है, लेकिन वह मुकेश अंबानी को कहीं का नहीं छोड़ेंगे, क्योंकि उनकी अलमारी में उनके (मुकेश अंबानी के) गुनाहों के कई कंकाल कैद हैं।
एस्सेल ग्रुप और जी मीडिया समूह के संस्थापक सुभाष चंद्रा द्वारा व्यक्तिगत रूप से 22,000 करोड़ रुपये का कर्ज नहीं लिया गया, बल्कि एस्सेल ग्रुप की कंपनियों द्वारा सार्वजनिक क्षेत्र के वित्तीय संस्थानों सहित कई ऋणदाताओं से लिए गए ऋण को जब ये नहीं चुका पाई और नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल ने इस कर्ज के मुख्य गारंटर सुभाष चंद्रा को पुनर्भुगतान के रूप में महज 6.25 करोड़ रुपये में एडजस्ट कर दिया।
तब लेनदारों की तरफ से यह आंकड़ा आया है कि वास्तव में लेनदारी तो 22,006.57 करोड़ रुपये बनती है और जो पुनर्भुगतान योजना के तहत भुगतान राशि तय की गई है वह महज .003 प्रतिशत है यानी पूरी चुकता की जाने वाली रकम में 99.97 फीसदी का हेयरकट किया गया है।
अगर लेनदारों का यह आरोप है तो फिर एनसीएलटी ने आखिर 6.25 करोड़ रुपये की पुनर्भुगतान योजना कैसे मंजूर की? इतनी कम धनराशि से एडजस्टमेंट का कोई तुक ही नहीं है।
इस मंजूरी का गणित यह है कि किसी रि-पेंमेंट प्लान को क्रेडिटर्स को जो समिति मंजूरी देती है, उस समिति में 77.48 प्रतिशत वोट इस प्लान की मंजूरी के पक्ष में आए और महज 18.42 प्रतिशत वोट इस मंजूरी के विरूद्ध पड़े, जबकि 4.10 फीसदी लेनदारों ने इस मामले में वोट नहीं दिया, वह पूरी वोट प्रक्रिया से बाहर रहे। इस तरह देखा जाए तो सारा खेल इस योजना को मंजूरी देने वाली समिति का खेल है। अब सवाल है ये समिति कौन है?
जब एनसीएलटी पर यह आरोप लगाए गए कि वह आखिर किसी देनदार को इतनी छूट कैसे दे सकती है, तो उसका तर्क था कि अदालत क्रेडिटर्स की कमर्शियल विजडम की जगह अपना फैसला नहीं सुना सकती और क्रेडिटर्स को लगता है कि चंद्रा की व्यक्तिगत संपत्ति से बैंक्रप्सी की स्थिति में मिलने वाली रकम प्रस्तावित योजना से भी कम होगी। इसलिए उपलब्ध रकम स्वीकार करने में ही भलाई है।
वास्तव में ये 5 लेनदार, जिन्होंने सुभाष चंद्रा को सिर्फ 6.25 करोड़ रुपये की देनदारी को मंजूरी दी, वे हैं- वीना इन्वेस्टमेंट, डायरेक्ट मीडिया डिस्ट्रीब्यूशन वेंचर्स, वर्ल्ड क्रेस्ट एडवाइजर्स, लेमोनडे कैपिटल एडवाजइर्स और क्रॉप्स सेल कैपिटल एडवाइजर्स इन 5 के पास मिलकर 61.71 प्रतिशत का वोटिंग शेयर बनता है और यही चाहते थे कि सुभाष चंद्रा को सिर्फ 6.25 करोड़ रुपये की पुनर्भुगतान छोड़ दिया जाए। इन पांचों में वर्ल्ड क्रेस्ट के पास अकेले 28.49 प्रतिशत का वोट शेयर था, जबकि लेमोनडे के पास 16.85 प्रतिशत के पर शेयर थे।
असली सवाल ये है कि क्या यह जो तथाकथित 22,006 करोड़ रुपये का घोटाला है, वह आम जनता की जेब से जाएगा? अगर सारे तिकड़मों को छोड़कर इसकी मूल तह पर जाएं तो अंततः इस घोटाले की कीमत आम लोगों को ही चुकानी पड़ेगी।
अगर सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक की जमा पूंजी से यह रकम निकलती है तो न सिर्फ आम डिपॉजिटर को किसी न किसी रूप में इसकी भरपाई करनी पड़ेगी, बल्कि बैंकों की इस पूंजी हानि से जो वास्तविक कर्ज लेने के इच्छुक हैं, उन्हें कर्ज नहीं मिल पाएगा। अंततः यह घोटाला आम लोगों और करदाताओं के हिस्से से ही जाएगा।
लेख- लोकमित्र गौतम के द्वारा