सोनम वांगचुक, जंतर मंतर, भूख हड़ताल,(सोर्स: नवभारत डिजाइन फोटो) 
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नवभारत विशेष: मानसून सत्र के पहले पुलिसिया बल प्रदर्शन, सरकार का अड़ियल रवैया

Sonam Wangchuk Protest: जंतर-मंतर पर 21 दिनों से भूख हड़ताल पर बैठे सोनम वांगचुक को स्वास्थ्य बिगड़ने के बाद पुलिस अस्पताल ले गई। इस कार्रवाई के बाद लोकतांत्रिक विरोध व प्रशासन को लेकर नई बहस छिड़ गई।

अंकिता पटेल

Sonam Wangchuk Hunger Strike: लोकतंत्र में संसद जितनी महत्वपूर्ण है, उतना ही महत्त्वपूर्ण है नागरिकों का लोकतांत्रिक विरोध प्रदर्शन। लेकिन सरकारें इस सच को नहीं स्वीकारती। 18 जुलाई की सुबह करीब 7 बजे दिल्ली के जंतर-मंतर पर 21 दिनों से भूख हड़ताल पर बैठे सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक के स्वास्थ्य की जांच के नाम पर सादे कपड़ों में आया 10 पुलिस वालों का एक समूह उस तरफ बढ़ा जहां सोनम वांगचुक भूख हड़ताल के तहत लेटे हुए थे।

कार्यकर्ताओं ने उन लोगों से पूछा कि आप कौन हैं? तो उन्होंने यही जवाब दिया कि हम सब डॉक्टर हैं और सोनम वांगचुक के स्वास्थ्य की जांच के लिए आए हैं। वे आगे बढ़े और सफेद चादर में सोनम वांगचुक को धरना स्थल से उठा ले गए, करीब 20 मिनट बाद दिल्ली पुलिस ने मीडिया को बताया कि सोनम वांगचुक की सेहत खराब होने की वजह से उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया है।

जंतर-मंतर पर कार्रवाई से लोकतांत्रिक अधिकारों पर सवाल

एक दिन पहले ही दिल्ली हाईकोर्ट ने दिल्ली सरकार और केंद्र सरकार को यह निर्देश दिया था कि सोनम वांगचुक के स्वास्थ्य पर लगातार निगरानी रखी जाए और हर हाल में उनके स्वास्थ्य की रक्षा की जाए। लेकिन बल प्रदर्शन के जरिए सोनम वांगचुक को अस्पताल पहुंचाया गया और वहां मौजूद आंदोलनकर्मियों की मानें तो उन्हें भद्दी-भद्दी गालियां भी दीं।

कम से कम पुलिस से इतने बुरे व्यवहार की आशंका तो नहीं थी। वास्तव में किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में सुरक्षा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच कैसे संतुलन साधा जाए, सरकारों के पास इसका एक ब्लू प्रिंट होता है और होना ही चाहिए, दिल्ली में जंतर-मंतर लंबे समय से देशभर के लोकतांत्रिक विरोध प्रदर्शनों का प्रतीकात्मक गढ़ रहा है। चाहे किसान आंदोलन हो, चाहे विभिन्न क्षेत्रों के कर्मचारियों की मांगों का आंदोलन हो, चाहे छात्र संगठनों का विरोध हो, जंतर-मंतर वर्षों से इसका मंच रहा है।

संसद मार्च से पहले कार्रवाई पर उठे सवाल

जिस तरह से 20 जुलाई यानी संसद के मानसून सत्र की शुरुआत वाले दिन कॉकरोच जनता पार्टी द्वारा बार-बार पेपर लीक होने के चलते शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर संसद तक पैदल मार्च का आह्वान किया गया है, शायद उस स्थिति से बचने के लिए सरकार ने पुलिसिया ताकत के प्रदर्शन का कदम उठाया है।

विपक्षी दल सरकार की इस कार्रवाई की मुखर आलोचना कर रहे हैं, लेकिन दिल्ली सरकार और केंद्र सरकार के अंडर आने वाली दिल्ली पुलिस ने कहा है कि राजधानी में किसी तरह की अव्यवस्था न फैले, इसके लिए यह जरूरी था। भारत का संविधान देश के हर नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण ढंग से विरोध प्रदर्शन की अनुमति देता है।

पेपर लीक पर जवाबदेही की मांग तेज

अगर देखा जाए तो छात्र आखिर मांग क्या कर रहे हैं? वो कह रहे हैं पिछले 5 वर्षों में जिस तरह बार-बार विभिन्न परीक्षाओं के पेपर लीक हुए हैं और इस व्यवस्था का खामियाजा छात्रों और उनके परिजनों को भुगतना पड़ा है। लगभग 150 से ज्यादा छात्रों ने आत्महत्याएं कर ली हैं।

इस सबके प्रति किसी को जिम्मेदारी तो लेनी ही होगी। आंदोलनकारी तो सिर्फ इतनी मांग कर रहे हैं कि बार-बार विभिन्न परीक्षाओं के प्रश्नपत्रों के लीक होने की जिम्मेदारी को लेते हुए शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा दें या प्रधानमंत्री उनसे इस्तीफा लें।

इस दुर्व्यवस्था से टूटकर जिन छात्रों ने अपनी जिंदगी खत्म कर ली है, सरकार उनके घर वालों को इसके लिए मुआवजा दे। देखा जाए तो सरकार से आंदोलनकारी कोई भी अनुचित मांग नहीं कर रहे, बल्कि सच्चाई तो यह है कि इस घोर अव्यवस्था को देखते हुए किसी भी संवेदनशील मंत्री को खुद ही इस्तीफा दे देना चाहिए, जिसके जिम्मे परीक्षाओं को सुचारू रूप से करवाने का दायित्व था।

सरकार का अड़ियल रवैया

लगता है अब केंद्र सरकार ने लोकतांत्रिक विरोध को अपने विरूद्ध साजिश ही मान लिया है, जिससे वह किसी भी तरह के विरोध को कतई स्वीकार नहीं करना चाहती। जिस तरह से केंद्र सरकार पिछले 21 दिनों से धरने पर बैठे छात्रों और सामजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक के प्रति उदासीन रही है, उससे लगता है कि ऐसी किसी लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति से कोई संवेदना ही नहीं है।

-लेख-नरेंद्र शर्मा के द्वारा

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