One Nation One Election Debate: आखिर 'एक राष्ट्र एक चुनाव' की अपनी योजना को लागू करने के लिए केंद्र सरकार क्यों इतनी जल्दबाजी कर रही है? अभी तो पी।पी। चौधरी की अध्यक्षता वाली संयुक्त संसदीय समिति देशभर में विभिन्न स्टेकहोल्डर या हितधारकों से परामर्श में जुटी है। उसकी राय जानने के बाद केंद्र को इस मुद्दे पर कदम बढ़ाने चाहिए, 2034 तक प्रतीक्षा करने की बजाय 2029 के लोकसभा चुनाव के साथ ही देश के अधिकांश राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों में एकसाथ चुनाव कराने की रणनीति पर विचार हो रहा है।
संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के अध्यक्ष चौधरी का कहना है कि यदि लोकसभा व राज्य विधानसभाओं के चुनाव एकसाथ कराए जाएं, तो भारत 7 लाख करोड़ रुपये बचा सकता है और इसमें देश की जीडीपी में 1।6 प्रतिशत की वृद्धि हो सकती है। यह समिति अब तक महाराष्ट्र, कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, हरियाणा व पंजाब का दौरा कर चुकी है। इस प्रस्ताव के समर्थकों का दावा है कि लोकसभा और विधानसभा चुनावों को एकसाथ कराने से फायदा यह होगा कि लंबे समय तक सुरक्षा बल तैनात करने की आवश्यकता नहीं रह जाएगी।
आचार संहिता की वजह से होने वाली दिक्कतें कम होंगी। बार-बार विकासकार्य नहीं रोकने पड़ेंगे। राजनीतिक पार्टियों को भी लगातार चुनाव प्रचार अभियान में व्यस्त नहीं रहना पड़ेगा। यह दलील दी जा रही है कि 1952 से 1967 तक लोकसभा व विधानसभा चुनाव एकसाथ हुआ करते थे। 'एक राष्ट्र एक चुनाव' के विचार से असहमत नेताओं की राय है कि पहले आबादी कम थी।
आज पूरे राष्ट्र में लोकसभा व विधानसभा के चुनाव साथ में कराने के लिए बहुत अधिक ईवीएम की आवश्यकता पड़ेगी। चुनाव मशीनरी पर बहुत जिम्मेदारी आ जाएगी। समूचे देश में एकसाथ सुरक्षाबलों को तैनात करना और संवेदनशील क्षेत्रों में व्यवस्था बनाए रखना बेहद कठिन व चुनौतीपूर्ण होगा। जिन पार्टियों के पास धन की कमी है वह एकसाथ दोनों चुनाव के लिए बड़े पैमाने पर खर्च करने में असमर्थ होंगी। क्योंकि अब चुनाव बहुत महंगे हो गए हैं।
लोकसभा चुनाव के साथ कितनी ही विधानसभाओं के मध्यावधि चुनाव कराने होंगे, जिनका अभी 2 या 3 वर्ष का कार्यकाल बाकी बचा हुआ है। पार्टी के अलावा विधायकों को फिर से चुनाव लड़ने का खर्च उठाना पड़ेगा। ऐसे चुनाव में कम बहुमत वाली सरकारें बनीं और दल-बदल हुआ, तो फिर सरकार गिरने से चुनाव की नौबत आ जाएगी। इस वजह से चुनाव सिर्फ कवायद बनकर रह जाएंगे।
एक साथ चुनाव कराने में राष्ट्रीय मुद्दे इतने प्रभावशाली हो जाएंगे कि स्थानीय समस्याओं और मुद्दों को पीछे छोड़ देंगे। चुनाव व जनादेश का इस समय जो लचीलापन है वह खत्म हो जाएगा। सबसे बड़ी बात यह कि इससे केंद्रीय सत्ता का राज्यों पर वर्चस्व बढ़ जाएगा जिससे संघीय या फेडरल व्यवस्था कमजोर होगी।
लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा