राहुल गांधी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग वाले आंदोलन को 'शिवजी की बारात' बताया।
आंदोलन को किसी पार्टी तक सीमित न रखकर जनता का आंदोलन बनाने की राहुल गांधी की कोशिश पर चर्चा।
शिवजी की बारात के पौराणिक प्रसंग और हिंदी फिल्मों के बारात वाले गीतों का दिलचस्प जिक्र।
बारात की परंपराओं और बारातियों से जुड़े किस्सों के जरिए राजनीतिक घटनाक्रम पर व्यंग्य।
Rahul Gandhi Shivji Ki Baraat Protest: पड़ोसी ने हमसे कहा, 'निशानेबाज, विपक्ष के नेता राहुल गांधी इस उम्र में भी कुंवारे हैं, लेकिन बारात निकालने का उनका अरमान पूरा हो गया। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचे जनसैलाब को 'शिवजी की बारात' का नाम दिया। राहुल ने कहा कि वह मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे को कांग्रेस का नहीं, बल्कि जनता का आंदोलन बनाना चाहते थे। वह इसे शिवजी की बारात का रूप देना चाहते थे, जिसमें किसी भी पार्टी या विचारधारा का कोई भी व्यक्ति शामिल हो सकता था।'
हमने कहा, 'खुशी की बात है कि राहुल ने आंदोलन को धार्मिक और पौराणिक संदर्भ से जोड़ा। जहां तक शिवजी की बारात की बात है, उसका उल्लेख शिवपुराण में मिल जाएगा। इस बारात में ब्रम्हा, विष्णु, इंद्र व समस्त देवताओं के अलावा शिवजी के सारे गण भी शामिल हुए, जिनमें भूत-प्रेत, पिशाच का समावेश था। ऐसी विचित्र बारात देखकर पार्वती की मां मैना बेहोश हो गई थीं। बाद में उमा या पार्वती के कहने पर शिवजी ने अपना सौम्य और मनोहर रूप धारण किया। देव आनंद व नलिनी जयवंत की पुरानी फिल्म 'मुनीमजी' का भोजपुरी गीत शिवजी की बारात को लेकर था।
उसके बोल थे- 'शिवजी बिहाने चले, पालकी सजाय के, भभूति रमाय के ना!' इसी तरह आपको फिल्म यादों की बारात का गीत याद होगा- 'यादों की बारात निकली है आज दिल के द्वारे, सपनों की शहनाई बीते दिनों को पुकारे!' नूरजहां ने पुरानी फिल्म अनमोल घड़ी में गाया था- 'आवाज दे कहां है दुनिया मेरी जवां है!' इस गीत की अगली पंक्ति थी 'आ रात जा रही है जैसे चांदनी की बारात जा रही है। चलने को अब फलक से तारों का कारवां है, ऐसे में तू कहां है!' फिल्म 'आह' में नरगिस ने गाया था- 'राजा की आएगी बारात, रंगीली होगी रात, मगन मैं नाचूंगी !'
पड़ोसी ने कहा, 'निशानेबाज, वारात पर नर्सरी का एक बालगीत भी है जिसके बोल हैं- 'आलू की निकली बारात, बाराती आए हजार, बैंगन आया बाजा बजाता, गाजर आया गाना गाता, टमाटर देखता है तमाशा, करेला पटाखे जलाता!'
हमने कहा, 'बारात निकालना हंसी-खेल नहीं है। इसमें नाराज फूफा से लेकर सनकी मामा तक को शामिल करना पड़ता है। पुराने जमाने में बाराती साथ में लाठी-डंडा लेकर निकलते थे, ताकि रास्ते में चोर-डाकू दहेज का सामान लूट न लें। इतने पर भी सच यह है कि हारे हुए जुआरी और लौटे हुए बाराती को कोई नहीं पूछता !'
लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा