

नेताओं के बार-बार बयान बदलने और पलटी मारने की राजनीति पर व्यंग्य।
जनता की प्रतिक्रिया जानने के लिए पहले बयान देना और विरोध होने पर सफाई पेश करने की रणनीति पर कटाक्ष।
सत्ता में बने रहने के लिए बदलते माहौल के अनुसार रुख बदलने और सुविधा की राजनीति करने पर सवाल।
नेताओं की विश्वसनीयता और खोखले वादों पर निशाना, जनता को सब समझने का संदेश।
Political Statements and Credibility: पड़ोसी नेता ने हमसे कहा, 'निशानेबाज, आप नहीं जानते कि जनसेवा के लिए हमें कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं। जनता नहीं जानती कि नेता उसके लिए कितना त्याग करता है। इतने पर भी मीडिया हमारा गुणगान करने की बजाय हमारी आलोचना करने में पीछे नहीं रहता। पता नहीं, ऐसा क्यों होता है?'
हमने कहा, 'आप पहले जोश में आकर कोई बयान देते हैं जिसकी वीडियो रिकॉर्डिंग होती है। अखबारों में भी छप जाता है। फिर न जाने क्यों आप अपनी कही हुई बात से मुकर जाते हैं अर्थात पलट जाते हैं। क्या पार्टी हाईकमांड के दबाव की वजह से ऐसा करते हैं?'
पड़ोसी नेता ने कहा, 'निशानेबाज, न तो हम पलटी खाते हैं, न मात खाते हैं। हमारा एक बयान पब्लिक की रिएक्शन या प्रतिक्रिया देखने के लिए होता है। इसे फीलर छोड़ना कहते हैं। जब उस बयान से लोग नाराज हो जाते हैं तो दूसरा बयान देकर बात संभाल लेते हैं। पॉलिटिक्स इसी को कहते हैं। इसे आप हमारा हथकंडा भी कह सकते हैं।'
हमने कहा, 'आप ऐसी दोमुंही बातें क्यों करते हैं? किसी एक बात पर मजबूती से कायम क्यों नहीं रहते? ऐसा करते रहेंगे तो आपकी साख पूरी तरह खत्म हो जाएगी? कोई आप पर भरोसा नहीं करेगा?'
पड़ोसी ने कहा, 'निशानेबाज, यह जमाना 'प्राण जाए पर वचन न जाए' का नहीं है। मौका और माहौल देखकर अपना रंग-ढंग, पैंतरा और बयान सब कुछ बदलना पड़ता है। पहले हम ओरिजिनल ट्यून में गाते हैं फिर रिमिक्स गाने की तरह ट्यून बदल देते हैं।'
हमने कहा, 'आप गिरगिट के समान रंग बदलना छोड़ दीजिए। सवाल आपकी विश्वसनीयता का है। आपको अपनी बात पर छाती ठोककर कायम रहना चाहिए। जो भी कहते हैं, उस पर अड़े क्यों नहीं रहते ? इतनी नौटंकी किसलिए करते हैं?'
पड़ोसी ने कहा, 'निशानेबाज, आपको मालूम होना चाहिए कि अड़े रहने से राजनीति नहीं चलती। पहले तन जाओ फिर ज्यादा दबाव पड़ने लगे तो झुक जाओ। जैसी पब्लिक सामने रहती है, उसे वैसी खुराक देनी पड़ती है। सत्ता में बने रहना है तो सुविधा की राजनीति करना जरूरी हो जाता है। खोखले वादों का डमरू बजाओ और नादान लोगों को अपने इशारे पर नचाओ!'
हमने कहा, 'अब यह चालबाजी बिल्कुल नहीं चलेगी क्योंकि ये पब्लिक है, सब जानती है, बाहर क्या है, अंदर क्या है, सब पहचानती है !'
लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा