प्रतीकात्मक तस्वीर ( सोर्स : सोशल मीडिया ) 
नवभारत विशेष

संपादकीय: मेलघाट में कुपोषण से मौत की गंभीर समस्या

Bombay High Court: मेलघाट में कुपोषण से शिशु व मातृ मृत्यु पर बॉम्बे हाई कोर्ट ने सरकार को फटकार लगाई। 6 महीनों में 65 से ज्यादा बच्चों की मौत पर नाराजगी जताई।

अंकिता पटेल

नवभारत डिजिटल डेस्क: मेलघाट में कुपोषण से बच्चों, गर्भवती महिलाओं व माताओं की मृत्यु की गंभीर समस्या की सरकार द्वारा अनदेखी किए जाने पर बाम्बे हाई कोर्ट की न्या। रवींद्र घुगे व न्या। अभय मंत्री की पीठ ने तीव्र नाराजगी व्यक्त की है।

कोर्ट ने कहा कि समस्याएं अनेक हैं लेकिन उन पर मात करने की इच्छाशक्ति सरकार के पास होनी चाहिए, इस बारे में सरकार को शून्य सहनशीलता या जीरो टालरेंस की नीति अपनानी चाहिए, यह भी निर्देश दिया गया कि प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र मजबूत बनाए जाएं तथा नए पदवीधर डाक्टरों के साथ अनुभवी स्त्रीरोग तथा बालरोग विशेषज्ञों की सेवा मेलघाट में उपलब्ध कराई जाए।

पिछले 6 महीनों में 65 से ज्यादा शिशुओं की वहां मौत हो चुकी है। हाई कोर्ट में 2006 से लेकर अब तक कुपोषण के मुद्दे पर अनेक याचिकाएं दाखिल की जा चुकी हैं। मेलघाट की चिंताजनक स्थिति पर 2023 में विस्तृत रिपोर्ट भी मंगाई गई थी।

महाराष्ट्र के महिला व बाल विकास मंत्री ने विधानसभा में लिखित उत्तर में बताया था कि राज्य में कुपोषण की वजह से 1.80 लाख मौतें हुई हैं। सरकारी वकील ने कहा कि सिर्फ कुपोषण नहीं बल्कि अन्य कारण भी हैं। मेलघाट में अधिकांश लड़कियों की शादी 13 वर्ष की उम्र में कर दी जाती है।

उन पर तत्काल मातृत्व का बोझ आ जाता है। कम उम्र में प्रसूति की वजह से वह जान गंवा बैठती हैं। अदालत ने वहां मूलभूत स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध कराने को कहा। महाराष्ट्र जैसे प्रगतिशील राज्य में कुपोषण से मृत्यु की गंभीर समस्या कई दशकों से बनी हुई है। बारिश के मौसम में मेलघाट का संपर्क राज्य के अन्य हिस्सों से पूरी तरह कट जाता है।

वहां सिर्फ महिला, बच्चे व बुजुर्ग ही रह जाते हैं। बाकी लोग काम करने अन्यत्र चले जाते हैं। यदि लोगों को पोषक आहार उपलब्ध कराया जाए, आयरन व विटामिन की गोलियां दी जाएं तथा समय-समय पर स्वास्थ्य परीक्षण हो तो इस त्रासदी को नियंत्रित किया जा सकता है। लोगों को अपने घर के अहाते में पालक, हरी सब्जियां व टमाटर की पैदावार करने को प्रोत्साहित किया जा सकता है।

कुपोषण की समस्या मुंबई के निकट पालघर में भी है। वहां के अर्धशहरी क्षेत्र में 3,000 से अधिक बेहद कुपोषणग्रस्त बच्चे हैं। शहरी गरीबी तथा स्वच्छ पेयजल का अभाव से भी बच्चों का स्वास्थ्य प्रभावित होता है। कुपोषण से मौत तो होती है, बच्चों का विकास भी नहीं हो पाता। वह नाटे और कम वजन के रह जाते हैं।

यह भी देखना होगा कि क्या प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में डॉक्टर मौजूद रहते हैं व दवाइयां उपलब्ध रहती हैं। महाराष्ट्र की जीडीपी 45 लाख करोड़ है। यदि सरकार ठान ले तो कुपोषण की समस्या हल की जा सकती है। यह खेद की बात है कि महाराष्ट्र में 5 वर्ष से कम आयु का हर तीसरा बच्चा कुपोषणग्रस्त है। सुशासन का तकाजा है कि इस ओर प्राथमिकता से ध्यान दिया जाए।

लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा

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