

Highlights:
कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी अपनी किताब ‘बिलॉन्गिंग: अ जर्नी ऑफ लव’ को लेकर चर्चा में हैं।
इस किताब में उन्होंने अपने जीवन के कई अनछुए पहलुओं पर बात की हैं, जो अब तक अनकही थी।
किताब में सोनिया गांधी ने अपने शुरुआती जीवन और राजीव गांधी के साथ हुई प्रेम कहानी का जिक्र किया है।
Sonia Gandhi on Prime Minister Post: कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी का बहुप्रतीक्षित संस्मरण ‘बिलॉन्गिंग: अ जर्नी ऑफ लव’ (Belonging: A Journey of Love) इन दिनों राजनीतिक गलियारों से लेकर साहित्यिक जगत तक खासी चर्चा का केंद्र बना हुआ है। इस किताब में उन्होंने अपने जीवन के कई अनछुए पहलुओं पर बात की हैं।
इटली में बीते बचपन, कैंब्रिज में राजीव गांधी से पहली मुलाकात और उसके बाद भारत के सबसे राजनीतिक परिवार की बहू बनने तक के सफर को बेहद संवेदनशीलता के साथ पन्नों पर उतारा है।
किताब के शुरुआती अध्यायों में सोनिया गांधी ने अपने शुरुआती जीवन और राजीव गांधी के साथ हुई प्रेम कहानी का जिक्र किया है। साल 1965 में जब वह कैंब्रिज में पढ़ाई कर रही थीं, तब उनकी मुलाकात राजीव गांधी से हुई थी। यह मुलाकात धीरे-धीरे गहरे प्रेम में बदली और साल 1968 में दोनों ने हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार विवाह कर लिया।
इसके बाद सोनिया पूरी तरह से एक आम गृहिणी की तरह भारत में रहीं और राजनीति से पूरी तरह दूर, परिवार की देखरेख में जुट गईं। राजीव गांधी एक पायलट के रूप में अपनी जिंदगी बिता रहे थे, और इस दंपती का राजनीति से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं था।
किताब में देश के सबसे विवादित राजनीतिक दौर यानी 'इमरजेंसी' का भी जिक्र किया गया है। सोनिया गांधी ने यह स्पष्ट करने की कोशिश की है कि उस दौर की परिस्थितियों और लिए गए फैसलों के लिए अकेले संजय गांधी को जिम्मेदार नहीं ठहराया जाना चाहिए। उन्होंने बताया कि उस वक्त इंदिरा गांधी पर पार्टी के कई वरिष्ठ और प्रभावशाली नेताओं का भी भारी दबाव था।
इसके साथ ही, उन्होंने राजीव गांधी की उस समय की सोच का जिक्र करते हुए लिखा है कि राजीव आम लोगों की शिकायतें और जमीनी फीडबैक सीधे इंदिरा गांधी तक पहुंचाते थे और उनकी वैचारिक सोच उस वक्त के कई अन्य नेताओं से काफी अलग थी।
इंदिरा गांधी और राजीव गांधी की त्रासद हत्याओं के बाद सोनिया गांधी के जीवन में आए भूचाल का भी इस किताब में विशेष उल्लेख है। परिवार के दो बड़े नेताओं को खोने के बाद भी सोनिया ने लंबे समय तक राजनीति से दूरी बनाए रखी। हालांकि, पार्टी और कार्यकर्ताओं के भारी दबाव के बाद उन्होंने 1998 में कमान संभाली और कांग्रेस की सबसे लंबे समय तक अध्यक्ष रहने का रिकॉर्ड बनाया।
किताब का एक सबसे दिलचस्प हिस्सा साल 2004 का वह वाकया है, जब लोकसभा चुनाव जीतने के बाद यूपीए को भारी समर्थन मिला और सहयोगियों ने उन्हें प्रधानमंत्री पद संभालने के लिए कहा। सोनिया गांधी ने खुद इस बात पर प्रकाश डाला है कि किन परिस्थितियों में उन्होंने देश के शीर्ष पद को ठुकराया था और डॉ. मनमोहन सिंह को देश की बागडोर सौंपने का ऐतिहासिक फैसला लिया था। सोनिया गांधी ने बताया कि राहुल और प्रियंका भी नहीं चाहते थे कि मैं प्रधानमंत्री बनूं।
यह संस्मरण जितना अपनी कहानियों को लेकर चर्चा में है, उतना ही इसके प्रकाशन से जुड़े घटनाक्रमों के कारण भी सुर्खियों में रहा है। पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया द्वारा इस किताब को भारत में प्रकाशित न करने के फैसले के बाद राजनीतिक दलों के बीच जुबानी जंग छिड़ गई थी। कांग्रेस नेताओं ने इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर कथित दबाव और हमला करार दिया था, जबकि प्रकाशक ने स्पष्ट किया था कि यह निर्णय किसी बाहरी दबाव के बजाय संपादकीय टीम और लेखकीय स्तर पर कुछ मुद्दों पर सहमति न बन पाने के कारण लिया गया था।
कुल मिलाकर, ‘बिलॉन्गिंग’ सिर्फ सोनिया गांधी की व्यक्तिगत आत्मकथा नहीं है, बल्कि यह आधुनिक भारतीय इतिहास के कई उतार-चढ़ाव, परिवार के भीतर के संघर्ष और देश की राजनीति के पर्दे के पीछे की कहानियों को समझने का एक बड़ा दस्तावेज साबित होने जा रही है।