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नवभारत विशेष: विपक्ष को बदलनी होगी रणनीति, सिर्फ सत्ता-विरोध से नहीं बनेगी बात

Opposition Political Strategy: भारतीय राजनीति में बदलते मतदाता व्यवहार के बीच विपक्ष की रणनीति पर सवाल उठ रहे हैं। कांग्रेस व विपक्षी दलों के सामने चुनौती है कि जनहित के मुद्दों पर अपनी दिशा तय करें।

अंकिता पटेल

Highlights

  • भारतीय राजनीति में बदलाव के बीच विपक्ष की रणनीति पर सवाल उठाए गए हैं।

  • लेख में मतदाताओं की बदलती अपेक्षाओं और रचनात्मक राजनीति पर जोर दिया गया है।

  • कांग्रेस को व्यक्तिगत हमलों के बजाय ठोस मुद्दों पर राजनीति करने की सलाह दी गई है।

  • मौजूदा सरकारी योजनाओं की वैचारिक जड़ों का निष्पक्ष आकलन करने की जरूरत बताई गई है।

Congress Political Strategy After 2014: भारतीय लोकतंत्र इस समय एक अनूठे वैचारिक और व्यावहारिक संक्रांति काल से गुजर रहा है। 2014 के बाद से देश की राजनीति के पारंपरिक नियम पूरी तरह बदल चुके हैं, लेकिन देश का मुख्य विपक्ष आज भी दशकों पुराने ढर्रे पर सत्ता परिवर्तन की उम्मीद लगाए बैठा है। हाल ही में बिहार के बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में प्रशांत किशोर की 'जन सुराज' पार्टी की ऐतिहासिक जीत ने इस बात को फिर साबित किया है कि भारतीय मतदाता अब केवल राजनीतिक शोर से प्रभावित नहीं होता। वह धरातल पर एक अनुशासित, गंभीर और रचनात्मक आचरण देखना चाहता है।

विपक्ष के लिए यह समय केवल सत्ता-विरोधी लहर के भरोसे रहने का नहीं, बल्कि अपनी पूरी राजनीतिक दृष्टि को पुनर्गठित करने का है। विपक्ष की रणनीतिक भूल यह रही है कि वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता को केवल व्यक्तिगत हमलों और अंध-विरोध के जरिए कम करने की कोशिश करता रहा है। कांग्रेस को इस बुनियादी हकीकत का निष्पक्ष अवलोकन करने की जरूरत है कि वर्तमान सरकार द्वारा चलाई जा रही अधिकांश सफल और लोकप्रिय योजनाएं वास्तव में कांग्रेस शासन के समय की ही देन हैं या उनकी वैचारिक संकल्पना उसी दौर में की जा चुकी थी।

कल्याणकारी योजनाओं का श्रेय और सियासी लाभ

मसलन जनता के कल्याण के लिए भेजा गया पैसा उस तक पूरा नहीं पहुंचता और बिचौलिए उसे खा जाते हैं- इस गंभीर प्रशासनिक बीमारी की पहचान का ऐतिहासिक श्रेय पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी को जाता है। भले ही आधुनिक अ तकनीक का इस्तेमाल करके इसका सफल इलाज नरेंद्र मोदी ने किया हो। आधार कार्ड, डिजिटल गवर्नेस और कल्याणकारी राज्य की नींव कांग्रेस की ही दूरदृष्टि का हिस्सा थी। यहाँ मुख्य अंतर राजनीतिक कौशल का है।

प्रधानमंत्री मोदी कांग्रेस की मूल योजनाओं का विरोध नहीं करते, बल्कि वे उनके अतीत के लचर क्रियान्वयन पर सवाल उठाते हैं और अपनी प्रशासनिक दक्षता से उन्हें लीकेज रहित बनाकर लाभार्थियों का एक विशाल और वफादार वोट बैंक तैयार कर लेते हैं। इसके विपरीत, कांग्रेस इन योजनाओं के गुण-दोष पर ध्यान देने के बजाय केवल 'मोदी विरोध' के एकसूत्रीय एजेंडे पर निर्भर हो जाती है। नतीजा यह होता है कि जनता से जुड़ाव का वह पारंपरिक सिरा कट जाता है और पार्टी को बार-बार असफलता का सामना करना पड़ता है।

कांग्रेस की रणनीति पर सवाल, जनकल्याण और वोट चोरी की चुनौती

कांग्रेस को इन जनकल्याणकारी योजनाओं की आलोचना करने के बजाय, इनमें अपनी ऐतिहासिक भागीदारी दर्शाने का हुनर सीखना होगा। जब तक विपक्ष इस नैरेटिव को जनता के बीच स्थापित करने का कौशल नहीं सीखता, तब तक वह अपनी ही बनाई पिच पर खुद को हिट-विकेट करता रहेगा। इसी नीतिगत भटकाव की एक बानगी आज की राजनीति के एक और विरोधाभासी पहलू में दिखती है, जहाँ मतदाता सूची संशोधन और 'वोट चोरी' के आरोपों को लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ विपक्ष द्वारा देशव्यापी उग्र प्रदर्शन और धरने दिए जा रहे हैं। क्या इस तरह के संस्था-विरोधी नैरेटिव से कांग्रेस को कोई वास्तविक चुनावी लाभ मिलेगा? व्यावहारिक धरातल पर देखें तो यह रणनीति हमेशा उलटा असर डालती है।

आम भारतीय मतदाता अपनी संवैधानिक संस्थाओं के प्रति बुनियादी आदर का भाव रखता है। जब विपक्ष चुनावी विसंगतियों का दोष सीधे संस्थाओं के सिर मढ़कर उनकी विश्वसनीयता को कटघरे में खड़ा करता है, तो जनता के बीच यह संदेश जाता है कि विपक्ष अपनी संगठनात्मक कमजोरियों को छिपाने के लिए बहानों का सहारा ले रहा है। सरकारें पूंजीपतियों से टैक्स वसूलकर उसे मुफ्त अनाज, सम्मान निधि और नकद हस्तांतरण जैसी योजनाओं के माध्यम से जनता में पुनर्वितरित कर रही हैं। इसे केवल 'रेवड़ी संस्कृति' कहकर खारिज करना आर्थिक नासमझी होगी; यह बदलते दौर की एक सामाजिक अनिवार्यता बन चुकी है।

अधिकांश योजनाएं कांग्रेस की देन थीं

नेहरू और इंदिरा गांधी के उस दौर में भी, जब विपक्ष संख्या बल में नगण्य था, तब भी राममनोहर लोहिया और अटल बिहारी वाजपेयी जैसे नेताओं की आवाज को सत्ता पक्ष उतनी ही गंभीरता से सुनता था क्योंकि उनकी आलोचना में राष्ट्रीय हित और रचनात्मकता होती थी। आज के विपक्ष को खोखली नारेबाजी से बाहर निकलकर जन-सरोकारों से जुड़ा एक नया, सकारात्मक और विश्वसनीय नैरेटिव देश के सामने रखना होगा।

लेख-कृष्णानंद शुक्ला के द्वारा

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