Highlights:
लेख में आरक्षण नीति की नए सिरे से समीक्षा करने और क्रीमी लेयर को बाहर रखने की मांग की गई है।
आरक्षण के लिए आय, संपत्ति और परिवार के आकार जैसी शर्तें तय करने का सुझाव दिया गया है।
केंद्र से सभी राज्यों के लिए आरक्षण के समान नियम बनाने की अपील की गई है।
छोटे मंदिरों के गरीब पुजारियों को भी आरक्षण का लाभ देने की बात उठाई गई है।
Reservation Policy Reform Debate: संविधान निर्माताओं ने आरक्षण की नीति केवल 15 वर्षों के लिए बनाई थी, जिसकी अवधि 26 जनवरी 1965 को समाप्त हो गई। ऐसा इसलिए था क्योंकि हमारी विकृत राजनीतिक व्यवस्था के कारण, राजनीतिक परिवारों सहित कुछ चुनिंदा परिवार ही इस नीति के लाभों का आनंद लेते रहे, जबकि वे अत्यधिक धनी हो चुके थे।
आरक्षण नीति पर नए सिरे से पूरी तरह विचार करने की आवश्यकता है। आरक्षित वर्गों के संपन्न तबके अर्थात 'क्रीमी लेयर' को अनिवार्य रूप से आरक्षण के दायरे से बाहर किया जाना चाहिए और उनकी पात्रता की सालाना समीक्षा भी होनी चाहिए।
अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य पिछड़ा वर्गों सहित विभिन्न श्रेणियों के लिए आरक्षण का कोटा निर्धारित करने के लिए केंद्र सरकार को एक समान नियम बनाना चाहिए। यह काम राज्यों के विवेक पर बिल्कुल नहीं छोड़ा जाना चाहिए। अक्सर ऐसा होता है कि राज्य मतदाताओं के कुछ वर्गों को खुश करने के लिए अतिरिक्त आरक्षण श्रेणियां बनाने वाले विधेयक पारित कर देते हैं। इसका एक उदाहरण महाराष्ट्र में मराठा समुदाय के लिए अतिरिक्त आरक्षण देने का प्रयास है, जिसे न्यायालय में चुनौती दी गई।
सर्वोच्च न्यायालय ने बार-बार कहा है कि उपलब्ध सीटों में कुल आरक्षण सामान्यतः 50 प्रतिशत की सीमा से अधिक नहीं होना चाहिए। हालांकि, किसी भी परिस्थिति में धर्म के आधार पर आरक्षण की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए, क्योंकि भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है। राजनीतिक दलों को अल्पसंख्यक समुदायों को खुश करने और वोट बैंक की राजनीति के लिए आरक्षण देने का विवेकाधिकार नहीं मिलना चाहिए। इसके अतिरिक्त, आरक्षित वर्गों में पिछड़ेपन का एक कारण सामान्यतः बड़े परिवार होना भी माना जाता है। इसलिए आरक्षण का लाभ केवल उन व्यक्तियों या परिवारों तक सीमित किया जाना चाहिए, जिनके दो या उससे कम बच्चे हों।
जाति-आधारित आरक्षण का लाभ भी केवल उन्हीं परिवारों को दिया जाना चाहिए, जिनकी वार्षिक आय 5 लाख रुपये से कम हो, जिनके पास 5 एकड़ से कम कृषि भूमि हो, जिनके आवास का क्षेत्रफल 1,000 वर्ग फुट से कम हो और जिनके आवासीय भूखंड का क्षेत्रफल अधिसूचित नगरपालिका क्षेत्र में 100 वर्ग गज तथा गैर-अधिसूचित नगरपालिका क्षेत्र में 200 वर्ग गज से कम हो। वास्तव में, मंदिरों में पूजा कराने वाले ब्राह्मण पुजारियों को भी आरक्षण की आवश्यकता है। छोटे मंदिरों में लोग देवताओं को चढ़ाने के लिए सबसे छोटे मूल्यवर्ग के सिक्के तलाशते हैं। ऐसे में पुजारियों का जीवन गरीबी रेखा से नीचे गुजरता है।
महिलाएं देश की लगभग 50 प्रतिशत आबादी हैं, फिर भी कानून बनाने वाली संस्थाओं में उनका प्रतिनिधित्व बहुत कम है। पुरुष प्रधान समाज में, विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में, महिलाएं आज भी वंचित और कमजोर स्थिति में हैं। सबसे पहली आवश्यकता यह है कि विधायिका, न्यायपालिका और नौकरशाही के सभी स्तरों पर महिलाओं को कम से कम 34 प्रतिशत आरक्षण दिया जाए। कई राजनीतिक दल धर्म और जाति जैसे मानव-निर्मित आधारों पर आरक्षण की मांग करते हैं, जो स्पष्ट रूप से वोट बैंक की राजनीति से प्रेरित दिखाई देती है। लेकिन वही दल महिलाओं के लिए आरक्षण का विरोध करते हैं, जबकि पुरुष-प्रधान राजनीतिक व्यवस्था में महिलाएं आज भी वंचित हैं।
पाकिस्तान सहित इस्लामी दुनिया के कई देशों और अनेक लोकतांत्रिक देशों ने भी विधायिकाओं में महिलाओं के आरक्षण की व्यवस्था अपनाई है। जब पंचायतों और स्थानीय निकायों में महिलाओं का आरक्षण पहले के 34 प्रतिशत से बढ़ाकर 50 प्रतिशत किया जा रहा है, तो विधायिकाओं में महिलाओं को 34 प्रतिशत आरक्षण देने का विरोध करना तर्कसंगत नहीं है। इसके बजाय, स्थानीय निकायों से लेकर संसद तक सभी स्तरों पर महिलाओं के लिए समान रूप से 34 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था होनी चाहिए। यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि चुनाव प्रचार के दौरान महिलाओं को उनके पतियों के प्रतिनिधि के रूप में इस्तेमाल न किया जाए।
पोस्टरों, होर्डिंगों और अन्य प्रचार माध्यमों में अक्सर देखा जाता है कि संबंधित क्षेत्र के प्रभावशाली राजनीतिक व्यक्ति अर्थात उम्मीदवार के पति का नाम बड़े अक्षरों में प्रमुखता से छापा जाता है, जबकि महिला उम्मीदवार का नाम छोटे अक्षरों में लिखा जाता है। आज महिलाएं खेल, रक्षा सेवाओं, सिविल सेवाओं, चिकित्सा, अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी और अन्य क्षेत्रों में उत्कृष्ट प्रदर्शन कर रही हैं।
लेख- सुभाषचंद्र अग्रवाल के द्वारा