Himalaya Glacier Melting Crisis: नेपाल संकट के बाद भारत के हिमालयी राज्यों में ग्लेशियरों और ग्लेशियल झीलों की निगरानी बढ़ाने के निर्देश जरूरी है, लेकिन आगामी 9 सितंबर यानी 'हिमालय दिवस' के अवसर पर हमें संकल्प लेना चाहिए कि हम पहाड़ों को केवल तभी नहीं देखेंगे, जब वे टूटकर नीचे आ चुके होंगे। हम हिमालय को अनवरत मापेंगे, समझेंगे तथा उसकी चेतावनियों को सुनते हुए सीखेंगे।
संयुक्त राष्ट्र ने भी हाल की आपदा को बदलते हिमालयी जोखिमों की चेतावनी माना है। समूचा हिमालय खतरे में है। यहां चट्टानों का टूटना, भूस्खलन, हिमस्खलन, ग्लेशियरों का सिकुड़ना, ग्लेशियल झीलों का विस्तार, पर्माफ्रॉस्ट का पिघलना और अत्यधिक वर्षा जैसी प्रक्रियाएं एक-दूसरे से जुड़ती हैं। एक घटना दूसरी दुर्घटना को जन्म दे सकती है।
2021 की चमोली आपदा इसका उदाहरण थी। वैज्ञानिकों ने प्रारंभिक जांच में इसे केवल 'ग्लेशियर फटने' के बजाय चट्टान, बर्फ और मलबे की जटिल श्रृंखला से जुड़ी घटना माना था। उस समय भी विशेषज्ञों का आग्रह था कि हिमालय में किसी बड़ी आपदा के बाद उसके कारण तलाशने से अधिक महत्वपूर्ण है, पहाड़ के भीतर चल रहे बदलावों की लगातार निगरानी करना। निगरानी से मिले संकेतों को समझना।
हिमालय के तेजी से गर्म होने के चलते खतरा बढ़ता जा रहा है। हिमालय में ग्लेशियरों के बर्फ-हानि की दर 2000 के बाद लगभग दोगुनी हो गई है। कुछ स्थानों पर बर्फ की मोटाई में 27 मीटर तक की कमी हुई है। देश में कम-से-कम 9,775 से लेकर लगभग 35,000 ग्लेशियर हैं। सेंट्रल वॉटर कमीशन 902 ग्लेशियल झीलों और जल निकायों की निगरानी करता है, वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जिओलॉजी 13 ग्लेशियरों की और नेशनल सेंटर फॉर पोलर एंड ओशन रिसर्च 6 ग्लेशियरों की निगरानी करता है।
जिओलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया और अन्य संस्थान कुछ चयनित ग्लेशियरों पर माप और मास-बैलेंस अध्ययन करते हैं। फिर भी निगरानी अपर्याप्त है। इन ग्लेशियरों को सेंसर से जोड़कर संभावित आपदा की चौबीसों घंटे चेतावनी देने वाला नेटवर्क अभी तक बहुत प्रभावी नहीं है। निगरानी केवल ग्लेशियर की नहीं होनी चाहिए, उसके दायरे में बर्फ, पर्माफ्रॉस्ट, उनसे लगी ढलान, ग्लेशियर निर्मित झील एवं नदी का संपर्क, वर्षा के अलावा संबंधित क्षेत्र में मानव निर्माण इत्यादि होने चाहिए।
2013 की केदारनाथ त्रासदी, 2021 की चमोली आपदा, 2023 की सिक्किम की दक्षिण ल्होनक झील से जुड़ी घटना और 2025 की धाराली आपदा के विश्लेषण से यह तथ्य सामने आता है कि हिमालय में छोटी-सी प्राकृतिक अस्थिरता अत्यधिक घनी आबादी, सड़क, पुल, सुरंग, बांध, जलविद्युत परियोजना और पर्यटन अवसंरचना से टकराकर बड़ी मानवीय आपदा बन सकती है।
यह सुखद है कि सरकार ने आईआईटी, वाडिया संस्थान, स्नो एंड एवलांच स्टडी एस्टैब्लिशमेंट तथा अन्य संस्थानों के सहयोग से उपग्रह आधारित ग्लेशियर मानचित्रण, राष्ट्रीय ग्लेशियर इन्वेंटरी, चयनित ग्लेशियरों का मास-बैलेंस अध्ययन और विभिन्न संस्थानों के माध्यम से क्रायोस्फियर अनुसंधान को आगे बढ़ाया है। वह उपग्रह आधारित वास्तविक समय निगरानी को प्रारंभिक बाढ़ चेतावनी से जोड़ने की भी कोशिश में है।
जरूरी कदम तो यह होना चाहिए कि सभी महत्वपूर्ण ग्लेशियर और हिमनदीय झीलों का नए सिरे से एक गतिशील डिजिटल मानचित्र बने और इसके साथ ही अत्यधिक जोखिम वाली झीलों पर हर क्षण चौकस रहने वाले सेंसर लगें।
अति संवेदनशील जमीनी सेंसर स्वचालित मौसम केंद्र, जल-स्तर मापक, भूकंपीय सेंसर, जीपीएस, रॉक-वॉल मूवमेंट सेंसर और पर्माफ्रॉस्ट तापमान सेंसर उन संकेतों को पकड़ सकते हैं, जिन्हें उपग्रह नहीं पकड़ पाता। वैज्ञानिक निगरानी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), उपग्रह, सेंसर और सीमा-पार डाटा साझाकरण से आपदा की तीव्रता और जनहानि को काफी कम जरूर किया जा सकता है।
हिमालय को निरापद बनाया जा सकता है। हिमालय भारत की जल-सुरक्षा, ऊर्जा-सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा का आधार है। इसलिए हिमालय दिवस केवल वृक्षारोपण या पर्यटन नियंत्रण तक सीमित नहीं रह सकता। हमें हिमालय को रोज देखना, मापना, समझना और उसकी चेतावनी सुनना सीखना होगा।
लेख- संजय श्रीवास्तव के द्वारा