ब्रिक्स करेंसी से क्यों डर रहा अमेरिका? (AI जेनरेटेड इमेज)
नवभारत विशेष

Dollar vs BRICS: क्या खत्म होगी डॉलर की बादशाहत, ब्रिक्स की नई करेंसी से क्यों डर रहा है अमेरिका?

BRICS Currency vs Dollar: क्या सच में खत्म हो सकती है डॉलर की बादशाहत? जानिए ब्रिक्स की संभावित नई करेंसी, डेडॉलराइजेशन, अमेरिका की चिंताओं और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले असर की पूरी कहानी।

मनोज आर्या

BRICS Currency vs Dollar Explained: अमेरिका-ईरान तनाव और राष्ट्रपति ट्रंप की टैरिफ धमकियों के बीच ब्रिक्स देश अपनी नई करेंसी या 'पेमेंट सिस्टम' पर काम कर रहे हैं। नई दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में शामिल होने वाले सदस्य देश डॉलर के समानांतर ब्रिक्स की नई करेंसी विकसित करने के मुद्दे पर चर्चा कर सकते हैं।

भारत की मेजबानी में हो रहे ब्रिक्स समिट 2026 के दौरान सदस्य देशों के बीच सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी (CBDऔर स्थानीय भुगतान प्रणालियों को आपस में जोड़ने को लेकर गहन विचार-विमर्श जारी है, जिसके कारण अमेरिका की चिंताएँ और बढ़ गई हैंहै।

ग्लोबल मार्केट में डॉलर कितना मजबूत?

वैश्विक बाजार में अमेरिकी डॉलर फिलहाल काफी मजबूत स्थिति में है और प्रमुख मुद्राओं के मुकाबले लगातार बढ़त बनाए हुए है। छह वैश्विक मुद्राओं के खिलाफ डॉलर की ताकत दिखाने वाला डॉलर इंडेक्स (DXY) 99.09 के स्तर पर कारोबार कर रहा है।

डॉलर बनाम ब्रिक्स करेंसी

मिडल ईस्ट में जारी संघर्ष, ईरान-अमेरिका युद्ध और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों (ब्रेंट क्रूड 107 डॉलर प्रति बैरल) के कारण दुनिया भर के निवेशक डॉलर को एक सुरक्षित निवेश मान रहे हैं, जिससे इसकी डिमांड तेजी से बढ़ी है।

ब्रिक्स करेंसी से क्यों डर रहा अमेरिका?

अमेरिका अक्सर रूस या ईरान जैसे देशों पर नकेल कसने के लिए डॉलर आधारित फाइनेंशियल सिस्टम (जैसे SWIFT) से उन्हें बाहर कर देता है। यदि ब्रिक्स देश अपना अलग डिजिटल पेमेंट नेटवर्क तैयार कर लेते हैं, तो अमेरिकी प्रतिबंधों का असर खत्म हो जाएगा

ब्रिक्स में अब 10 से अधिक पावरफुल इकोनॉमी (जैसे भारत, चीन, रूस, यूएई, सऊदी अरब आदि) शामिल हैं। जब ये देश तेल और अन्य कमोडिटीज का लेनदेन डॉलर की जगह अपनी करेंसी में करेंगे, तो डॉलर की वैश्विक मांग में भारी कमी आएगी।

डॉलर का राजनीतिक दबदबा
वर्तमान में दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों को अपने रिजर्व में डॉलर रखना पड़ता है। ब्रिक्स की 'डी-डॉलरॉइजेशन' नीति से अमेरिका की इस वैश्विक वित्तीय दादागिरी को सीधी चोट पहुंचती है। इसलिए अमेरिका ब्रिक्स की नई करेंसी को लेकर काफी सतर्क नजर आ रहा है।

क्या खत्म हो जाएगी डॉलर की बादशाहत?

एक्सपर्ट्स का मानना है कि किसी नई ब्रिक्स साझा करेंसी को लाना बेहद जटिल है क्योंकि चीन के युआन, भारत के रुपये और रूस के रूबल के हित अलग-अलग हैं। भारत साफ कर चुका है कि वह किसी 'साझा ब्रिक्स करेंसी' के पक्ष में नहीं है।

वर्तमान कदम सिर्फ डॉलर को खत्म करने के लिए नहीं, बल्कि इमरजेंसी स्थिति के लिए एक वैकल्पिक रास्ता बनाने के लिए हैं।

ब्रिक्स करेंसी क्या है?

ब्रिक्स करेंसी ब्रिक्स समूह के देशों द्वारा अमेरिकी डॉलर पर अपनी निर्भरता कम करने और आपसी व्यापार को आसान बनाने के लिए प्रस्तावित एक संभावित साझा करेंसी या ऑप्शनल पेमेंट सिस्टम है।

ब्रिक्स देशों के बीच किसी एक साझा फिजिकल या डिजिटल मुद्रा (जैसे यूरोप का यूरो) को लेकर अभी तक कोई ठोस सहमति नहीं बन पाई है।

ब्रिक्स देशों की मौजूदा करेंसी

वर्तमान में ब्रिक्स देश अमेरिकी डॉलर को छोड़कर अपनी-अपनी स्थानीय मुद्राओं (जैसे रुपया, युआन, रूबल) में आपसी व्यापार कर रहे हैं। डॉलर और SWIFT सिस्टम को दरकिनार करने के लिए एक वैकल्पिक डिजिटल भुगतान प्रणाली पर काम चल रहा है, जिससे सीमा-पार भुगतान सस्ते और तेज हों।

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