Yarlung Tsangpo Dam India Impact: नेपाल-चीन सीमा पर 26 अगस्त को ग्लेशियर फटने से ऐसी भयावह तबाही आई, जैसी पहले न देखी गई थी और न ही सुनी गई थी। यह काफी हद तक मानव निर्मित आपदा थी। इस त्रासदी के बाद अनुमान यह था कि चीन यारलुंग त्संगपो नदी जो अरुणाचल प्रदेश में आकर ब्रह्मपुत्र नदी बन जाती है, पर विशाल हाइड्रोइलेक्ट्रिक बांध, जिसे वह 'प्रोजेक्ट ऑफ द सेंचुरी' कहता है, के निर्माण का इरादा त्याग देगा, विशेषकर इसलिए कि निर्माण-स्थल भारत से लगी सीमा के निकट तिब्बत के भूकंप सक्रिय क्षेत्र में है। प्रस्तावित बांध की अनुमानित लागत 137 बिलियन डॉलर है और इससे 60 गीगावॉट्स बिजली का उत्पादन होगा। इस बांध का भारत पर बहुत गहरा असर पड़ेगा।
सवाल यह है कि चीन यह बांध क्यों बना रहा है और इस संदर्भ में भारत को क्या करना चाहिए? यह बांध बीजिंग के विशाल ऊर्जा सुरक्षा लक्ष्यों का हिस्सा है या सीमा वार्ता पर दिल्ली को बैकफुट पर करने की गहरी साजिश ? तथ्य यह है कि यारलुंग को लेकर चीन की महत्वाकांक्षी योजनाएं बहुत पुरानी हैं।
अपनी 12वीं पंचवर्षीय योजना (2011-2015) में बीजिंग ने यारलुंग के ऊपरी व बीच के हिस्सों में अनेक बांध बनाना प्रस्तावित किया था, जिसमें डागू डैम (640 मेगावाट), जन्गामू डैम (510) मेगावाट) व जीअचा डैम (320 मेगावाट) के अतिरिक्त एक अन्य जेक्सु डैम भी था। जन्गामू डैम चल रहा है जबकि 3 अन्य डैम रुके हुए हैं। क्योंकि उनमें तकनीकी व लॉजिस्टिकल चुनौतियां बाधा उत्पन्न किए हुए हैं।
ऊबड़-खाबड़ जमीन, तीव्र ढलान वाले पहाड़ और गहरी खाइयां 'सुपर डैम' के निर्माण में बहुत बड़ी चुनौती है। इसलिए यह संभव है कि चीन की बड़ी घोषणा वास्तविक निर्माण की बजाय भारत को परेशान करने के लिए हो। सबसे अधिक डरावनी बात यह है कि तिब्बत में भूकंप के खतरे हमेशा बने रहते हैं। मेडोग काउंटी जहां सुपर डैम बनाना प्रस्तावित है, वहां से तिनगरी लगभग 1,200 किमी के फासले पर है।
क्या यह प्राकृतिक आपदाएं चीन की महत्वाकांक्षी योजना को पटरी से उतार देंगी? नहीं। चीन सुपर डैम बनाने के लिए इन खतरों को अनदेखा कर देगा। उसकी अतीत की हरकतें बताती हैं कि वह प्रकृति की परवाह नहीं करता है। भारत के साथ सीमा विवाद में नदी उसके लिए राजनीतिक हथियार बन गई है। भारत को उत्तर-पूर्व क्षेत्र में अपनी क्षमता व गुंजाइश को निरंतर मजबूत करते रहना चाहिए। इसमें शामिल है कि चीन से जो नदियां आ रही हैं, उनके जल प्रवाह की स्वयं निगरानी को बढ़ा देना चाहिए, जिसके लिए बाढ़ के खतरे को मैप व भविष्यवाणी करने के लिए सुपीरियर सैटेलाइट्स प्रयोग करना होगा और टेलीमेट्री स्टेशनों को अपग्रेड करना होगा।
दूसरा यह कि स्टोरेज सुविधाओं, तटबंध, बाढ़ के पानी को मोड़ देने व शमन के लिए ब्लूप्रिंट तैयार करना होगा। ब्रह्मपुत्र पर स्टोरेज सुविधाएं बनाना आवश्यक है, जिसमें जगह के चयन, भूकंप की आशंका, इकोलॉजी और स्थानीय जरूरतों का ख्याल रखा गया हो। तीसरा यह कि ब्रह्मपुत्र बेसिन में अंदरूनी नौपरिवहन को अधिक बढ़ाना होगा।
अंदरूनी जलमार्गों पर अधिक निवेश करना होगा ताकि ब्रह्मपुत्र नेशनल वॉटर-वे 2 आर्थिक गलियारे के रूप में काम करे और उसका सीधा संपर्क चिट्टागोंग (बांग्लादेश) और हल्दिया (पश्चिम बंगाल) की बंदरगाहों से हो जाए। चीन के साथ जल समझौता होना मुश्किल ही लगता है। ऐसे में भारत यह कर सकता है कि पानी की मात्रा से आगे बढ़कर अपना वॉटर एजेंडा तैयार करे और सीमा पर क्लाइमेट चेंज, आर्द्रभूमि व जैव-विविधता की विस्तृत चिंताओं को सामने लेकर आए। इन पर दोनों भारत व चीन ने संबंधित कन्वेंशनों में हस्ताक्षर किए हुए हैं।
भारत के लिए यह अत्यधिक चिंता व खतरे का विषय है। लेकिन लगता यह है कि चीन मेगा बांध बनाने की अपनी योजना को रोकने के लिए तैयार नहीं है। उसने रीन्यूएबल एनर्जी के लिए अपनी 15वीं पंचवर्षीय योजना में इस बांध को शामिल किया है। चीन यारलुंग त्संगपो नदी पर एक बांध पहले ही बना चुका है, जिसके बारे में उसका कहना है कि इस बांध से दक्षिण-पश्चिम चीन के शिजंग स्वायत्त क्षेत्र (जो वास्तव में तिब्बत है) की लगभग 26 प्रतिशत बिजली मांग की पूर्ति हो गई है।
लेख-नौशाबा परवीन के द्वारा