Ram Temple Donation Controversy: अयोध्या के वकीलों का मानना है कि राम मंदिर में चढ़ावे की तथाकथित चोरी व अनियमितताओं से जन आस्था के साथ जबरदस्त विश्वासघात हुआ है। इस नैतिकता बनाम वैधानिकता की वजह से राष्ट्रव्यापी बहस छिड़ गई है। अयोध्या के वकील 'नैतिकता' व जनता के गुस्से के आधार पर आरोपियों का मुकदमा नहीं लड़ना चाहते, जबकि दूसरी ओर कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि भारतीय संविधान प्रत्येक आरोपी को अधिकार देता है कि अदालत में बचाव हेतु उसका प्रतिनिधित्व करने के लिए वकील की सेवाएं मिल सकें। ज्ञात रहे कि कोई भी अभियुक्त उस समय तक मुजरिम नहीं होता है जब तक कि अदालत उसे दोषी मानते हुए उसके खिलाफ सजा न सुना दे।
इंसाफ का तकाजा यह है कि अगर कोई आरोपी अपनी कमजोर आर्थिक स्थिति या किसी अन्य कारण से अपनी बात रखने के लिए वकील की व्यवस्था नहीं कर सकता, तो सरकार अपने खर्च पर उसके लिए वकील का इंतजाम करायेगी। इसका अर्थ यह हुआ कि अगर स्थानीय वकील आरोपियों का बायकाट जारी रखेंगे तो आखिरकार अदालत को ही उनके लिए वकील नियुक्त करने पड़ेंगे ताकि उचित कानूनी प्रक्रिया का पालन सुनिश्चित हो सके, सीसीटीवी से खुलासा हुआ है कि राम मंदिर में कम से कम 70 बार चोरी हुई।
इसे मद्देनजर रखते हुए यह रहस्य है कि पुलिस ने आरोपियों की रिमांड क्यों नहीं ली ? क्या साजिश में बड़े नाम खुलने का अंदेशा था? या किसी को बचाने का प्रयास जारी है? जनता को सबसे अधिक बेचैनी इस बात को लेकर है कि एफआईआर में आरोपियों के पिता के नाम व पते क्यों नहीं हैं, जबकि वह सभी अयोध्या में है और पुलिस तो मिनटों में आरोपी की जन्म कुंडली तक खोज लेती है। दरअसल, यह बेचैनी कानून की जानकारी न होने की वजह से है।
सवाल यह है कि ट्रस्टी कृष्ण मोहन को भी आरोपियों, जो उनके लिए वर्षों से काम कर रहे थे, के पिताओं के नाम व पते मालूम नहीं थे, जबकि नियुक्ति रिकार्ड व रजिस्टर में से आसानी से मालूम किया जा सकता था। एसआईटी ने अपनी जांच में आरोपियों की व्यक्तिगत डिटेल्स की जानकारी तो अवश्य ली होगी। एफआईआर में पिता का नाम न होने से एफआईआर अवैध नहीं हो जाती है।
अयोध्या के वकीलों ने जो आरोपियों का केस न लड़ने का फैसला किया है वह भले ही जनता में नैतिकता के आधार पर प्रशंसनीय समझा जा रहा हो, लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से यह चंदा चोरी में लिप्त आशंकित बड़ी मछलियों को सुरक्षा कवच प्रदान करने में ही मदद करेगा। अदालत जो आरोपियों को वकील उपलब्ध कराती हैं वह अक्सर खानापूर्ति ही करते हैं; क्योंकि केस में उनकी कोई खास दिलचस्पी होती नहीं है।
लेकिन आरोपी जो अपने खर्च पर वकील करता है, तो वह वकील अपने मुवक्किल को बचाने के लिए केस की जड़ तक पहुंचता है, जिससे अक्सर बड़े-बड़े राज भी खुल जाते हैं। राम मंदिर में चंदा चोरी के जो नये रहस्य रोजाना खुल रहे हैं, उनसे यही प्रतीत हो रहा है कि मामला पुराना, गंभीर व गहरा है।
इससे आमजन की आस्था को बहुत गहरा सदमा पहुंचा है। इसलिए यह जरूरी है कि दूध का दूध और पानी का पानी किया जाये। यह तभी मुमकिन हो सकता है जब अयोध्या के वकील अपनी जिम्मेदारी को समझते हुए मामले की तह तक पहुंचने में सहयोग करें और किसी भी स्तर पर लीपापोती न होने दें।
अयोध्या की स्थानीय बार एसोसिएशन ने सर्वसम्मति से यह चेतावनी देते हुए प्रस्ताव पारित किया है कि जो भी वकील राम मंदिर के चंदा चोरी आरोपियों का अदालत में कानूनी बचाव करने का प्रयास करेगा, उस पर पांच लाख रुपये का मोटा जुर्माना लगाया जायेगा, दूसरे शब्दों में अयोध्या बार एसोसिएशन ने सामूहिक रूप से फैसला किया है कि चंदा चोरी के आरोप में हिरासत में लिए गए 8 संदिग्धों का मुकदमा कोई वकील नहीं लड़ेगा।
लेख-नरेंद्र शर्मा के द्वारा