सरकार ने अग्निवीरों के 25% को नियमित सेवा और शेष 75% को दो साल का सेवा विस्तार देने का फैसला किया है।
रोजगार और पुनर्वास की चुनौती को इस फैसले की संभावित वजह बताया गया है।
लेख में अग्निपथ योजना के तहत चार साल बाद अग्निवीरों के भविष्य और रोजगार पर सवाल उठाए गए हैं।
सरकार से भर्ती और निजी क्षेत्र में रोजगार के लिए ठोस योजना बनाने की मांग की गई है।
Agniveer Recruitment and Employment Challenges: केद्र सरकार ने 4 वर्षों का प्रशिक्षण पूर्ण करने जा रहे अग्निवीरों के प्रथम बैच में से 25 प्रतिशत को नियमित सेवा में शामिल करने तथा शेष 75 फीसदी अग्निवीरों को 2 वर्ष का सेवा विस्तार देने का निर्णय लिया है। इसके बाद उनकी पात्रता व इच्छा पर नियमित सेवा का मार्ग खुला रहेगा।
सरकार के इस निर्णय के पीछे यह वजह हो सकती है कि 4 माह बाद उत्तरप्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड राज्यों में विधानसभा चुनाव हैं। यदि बड़ी तादाद में अग्निवीर सेवामुक्त कर दिए गए तो इसका चुनाव पर विपरीत असर पड़ सकता है। इसके अलावा 4 वर्ष का प्रशिक्षण हासिल करने के बाद लाखों अग्निवीरों को रोजगार देने की व्यापक वैकल्पिक व्यवस्था भी नहीं है। इन शस्त्रास्त्र प्रशिक्षित युवाओं को सेवामुक्त करने के बाद कानून व्यवस्था की समस्या भी उत्पन्न हो सकती थी।
पहले ही जेन-जी के आंदोलन ने बेरोजगारी के मुद्दे पर सरकार को चुनौती दे रखी है। इसलिए 2 वर्ष का एक्सटेंशन देना तय किया गया। लगभग 3 लाख अग्निवीरों का प्रशिक्षण इसी माह पूरा होने जा रहा है। इस सेवा विस्तार के निर्णय से सेना के खर्च में वृद्धि होगी। जब अग्निपथ योजना शुरू की गई तब उसकी आलोचना इस बात को लेकर की गई थी कि यह स्थायी रोजगार देने वाली नहीं है। एक युवा जब 4 वर्ष का प्रशिक्षण पूरा कर बेरोजगार हो जाएगा। तो उनका पुनर्वास कैसे किया जाएगा? इन 4 वर्षों में वह पढ़ाई या अन्य नौकरी भी नहीं कर पाएगा। अन्य क्षेत्रों में अपनी योग्यता व हुनर भी नहीं बढ़ा पाएगा।
क्या उसे सेना, पुलिस, अन्य सुरक्षाबलों में नौकरी दी जाएगी? उसकी पेंशन का भी मुझ उस समय उठा था। इसके बाद तय हुआ था कि उसके वेतन की एक निश्चित राशि काटी जाएगी जो उसे प्रशिक्षण के बाद दे दी जाएगी। एक नियमित सैनिक जवान और अग्निवीर के बीच वेतन, सुविधा और अन्य लाभ को लेकर बड़ा अंतर था। जब 2014-15 में वन रैंक वन पेंशन योजना लागू की गई तो सेना में वेतन और पेंशन बढ़कर वार्षिक रक्षा बजट के आधे से भी ज्यादा हो गई।
इसलिए सेना की तादाद कम करने तथा आधुनिकीकरण करने का लक्ष्य रखते हुए 4 वर्ष पूर्व अग्निपथ योजना लागू की गई। यूपी, पंजाब, उत्तराखंड व हिमाचल प्रदेश ऐसे राज्य हैं जहां सेना में भर्ती होना परंपरा के तौर पर गौरवपूर्ण माना जाता है। कितने ही परिवार पीढ़ियों से फौज में हैं। अग्निवीरों को 4 वर्ष प्रशिक्षण के बाद निजी क्षेत्र में वैकल्पिक काम मिलने के पर्याप्त अवसर नजर नहीं आ रहे हैं।
सैनिकों को आधुनिक युद्ध के हुनर के लिए तैयार करने में केवल 4 वर्ष का समय काफी नहीं हैं। यह भी आशंका व्यक्त की गई थी कि यदि इन्हें बेरोजगार किया गया तो असामाजिक तत्व कहीं इनका गलत इस्तेमाल न करें। अब सरकार को तय करना होगा कि क्या वह अग्निवीरों की भर्ती कम करे या उन्हें निजी क्षेत्र में रोजगार दिलाने के लिए कोई ठोस योजना बनाए, यदि अग्निवीर को सिक्योरिटी गार्ड का जॉब मिलता है तो उसका वेतन बहुत कम होगा जिसमें परिवार की गुजरबसर करना मुश्किल हो जाएगा।
लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा