अहोई अष्टमी 2026 का व्रत 1 नवंबर, रविवार को रखा जाएगा।
अहोई अष्टमी पर महिलाएं संतान की सुख-समृद्धि और अच्छे स्वास्थ्य की कामना करती हैं।
स्याहू माला चांदी के छोटे मनकों और स्याही की आकृति वाले लॉकेट से बनाई जाती है।
कई परिवारों में हर साल माला में एक या दो नए चांदी के दाने जोड़ने की परंपरा है।
स्याहू माला को संतान की लंबी उम्र, उन्नति और खुशहाली की कामना का प्रतीक माना जाता है।
Ahoi Ashtami Syahu Mala: अहोई अष्टमी का व्रत संतान की सुख-समृद्धि और खुशहाली की कामना से रखा जाता है। इस दिन माताएं अहोई माता की पूजा करती हैं और संतान की लंबी उम्र व अच्छे स्वास्थ्य की प्रार्थना करती हैं। इस व्रत से जुड़ी कई परंपराएं हैं, जिनमें चांदी की स्याहू माला पहनना भी खास माना जाता है।
कई परिवारों में महिलाएं इस माला को गले में धारण करती हैं और हर साल इसमें चांदी के नए दाने जोड़ती हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि स्याहू माला क्या होती है और इसमें हर साल नए दाने जोड़ने के पीछे क्या मान्यता है? आइए जानते हैं।
पंचांग के अनुसार, साल 2026 में अहोई अष्टमी का व्रत 1 नवंबर, रविवार को रखा जाएगा। इस दिन माताएं अहोई माता की पूजा करती हैं और शाम को तारों को अर्घ्य देकर व्रत का पारण करती हैं। नई दिल्ली में पूजा का शुभ मुहूर्त शाम 5:36 से 6:54 बजे तक रहेगा। दूसरे शहरों में समय अलग हो सकता है।
स्याहू माला चांदी के छोटे-छोटे मनकों और स्याहू यानी साही की आकृति वाले लॉकेट से बनाई जाती है। इसे आमतौर पर लाल धागे या मौली में पिरोया जाता है। कुछ परिवारों में माला में अहोई माता का प्रतीक भी लगाया जाता है। पूजा के दौरान इसे अहोई माता के सामने रखा जाता है और पूजा के बाद महिलाएं गले में धारण करती हैं।
अहोई अष्टमी की स्याहू माला से जुड़ी खास परंपरा हर साल इसमें नए चांदी के दाने जोड़ना है। कई परिवारों में व्रत रखने वाली महिलाएं हर साल एक या दो नए मनके माला में पिरोती हैं। कुछ जगहों पर मनकों की संख्या संतान की संख्या के अनुसार भी रखी जाती है। धार्मिक मान्यता में इन नए दानों को बच्चों की लंबी उम्र, उन्नति और खुशहाली की कामना का प्रतीक माना जाता है। हालांकि, यह रीति अलग-अलग परिवारों और क्षेत्रों में अलग हो सकती है।
स्याहू माला को केवल आभूषण नहीं, बल्कि मां की ममता और संतान के प्रति शुभकामना से जुड़ा प्रतीक माना जाता है। इसे धारण करते समय महिलाएं अहोई माता से अपने बच्चों के सुखी और स्वस्थ जीवन की प्रार्थना करती हैं। इस परंपरा के पीछे परिवार की आस्था और पीढ़ियों से चली आ रही पूजा-पद्धति जुड़ी हुई है।
परिवार की परंपरा के अनुसार, महिलाएं अहोई अष्टमी की पूजा से पहले माला को पूजा स्थल पर रखती हैं। अहोई माता की पूजा और कथा सुनने के बाद इसे गले में धारण किया जाता है। कुछ परिवारों में इसे दिवाली तक पहनने की परंपरा है। इस तरह स्याहू माला अहोई अष्टमी के व्रत की एक खास पहचान बन गई है।