रमा एकादशी कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष में आती है।
यह व्रत भगवान विष्णु की पूजा और भक्ति के लिए समर्पित है।
रमा एकादशी की कथा में राजा मुचुकुंद, चंद्रभागा और शोभन का वर्णन मिलता है।
इस दिन भक्त व्रत रखने के साथ भगवान विष्णु की पूजा और व्रत कथा का पाठ करते हैं।
Rama Ekadashi Vrat katha: 5 नवंबर, गुरुवार को रमा एकादशी व्रत रखा जा रहा हैं। हिंदू धर्म में रमा एकादशी का विशेष महत्व माना जाता है। यह एकादशी कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष में आती है और भगवान विष्णु की पूजा के लिए समर्पित होती है। इस दिन भक्त व्रत रखते हैं और विधि-विधान से पूजा करने के बाद रमा एकादशी की कथा पढ़ते या सुनते हैं।
इस व्रत से जुड़ी पौराणिक कथा में राजा मुचुकुंद, उनकी पुत्री चंद्रभागा और दामाद शोभन का उल्लेख मिलता है। आइए जानते हैं रमा एकादशी की पूरी कथा और इसका धार्मिक महत्व।
पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीन समय में मुचुकुंद नाम के एक राजा हुआ करते थे। वे भगवान विष्णु के परम भक्त और धर्म का पालन करने वाले शासक थे। उनकी मित्रता इंद्र, यमराज, वरुण और कुबेर जैसे देवताओं से थी। उनकी एक पुत्री थी, जिसका नाम चंद्रभागा था। चंद्रभागा का विवाह राजा चंद्रसेन के पुत्र शोभन से हुआ था।
एक बार शोभन अपनी पत्नी चंद्रभागा के साथ उनके पिता के घर आए। उसी समय कार्तिक मास की रमा एकादशी आ गई। राजा मुचुकुंद के राज्य में एकादशी के दिन सभी लोग व्रत रखते थे। शोभन शारीरिक रूप से कमजोर थे और उनके लिए भूखा रहना कठिन था। इस कारण चंद्रभागा को उनकी चिंता होने लगी। हालांकि, शोभन ने भी एकादशी का व्रत रखने का निर्णय लिया।
कथा के अनुसार, अगले दिन सूर्योदय के समय शोभन का निधन हो गया। राजा मुचुकुंद ने उनका अंतिम संस्कार करवाया। रमा एकादशी के व्रत के प्रभाव से शोभन को मंदराचल पर्वत पर एक सुंदर दिव्य नगर प्राप्त हुआ। वहां वे सुखपूर्वक रहने लगे।
कुछ समय बाद सोमशर्मा नाम के एक ब्राह्मण तीर्थयात्रा करते हुए उस दिव्य नगर पहुंचे। वहां उन्होंने शोभन को देखा और उनसे बातचीत की। शोभन ने उन्हें अपनी पत्नी चंद्रभागा तक यह संदेश पहुंचाने के लिए कहा कि वे उनसे मिलने आएं। सोमशर्मा ने वापस लौटकर चंद्रभागा को पूरी बात बताई।
अपने पति का समाचार सुनकर चंद्रभागा उनसे मिलने के लिए उत्सुक हो गईं। इसके बाद वे ऋषि वामदेव के पास पहुंचीं। ऋषि की कृपा और अपने एकादशी व्रतों के पुण्य से चंद्रभागा दिव्य स्वरूप प्राप्त करके शोभन के पास पहुंचीं। इस तरह दोनों का पुनर्मिलन हुआ।
इस कथा के माध्यम से श्रद्धा, भक्ति और भगवान विष्णु के प्रति समर्पण का संदेश मिलता है। मान्यता है कि रमा एकादशी का व्रत करने और कथा सुनने से भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है।