Premanand Ji Maharaj (Source. Pinterest) 
धर्म

आगे बढ़ना है तो किसी को अपना मत बनाना, Premanand Ji Maharaj का ऐसा उपदेश जो ज़िंदगी की दिशा बदल दे

Renunciation of Attachment: आध्यात्मिक मार्ग पर चलने वाले साधक के लिए सबसे बड़ा सत्य यही है "कभी भी, सपने में भी किसी को या किसी चीज़ को 'मेरा' मत मानो।" Shri Premanand Ji Maharaj ने इसको बात की।

सिमरन सिंह

Secrets of The Path of Devotion By Premanand Ji Maharaj: आध्यात्मिक मार्ग पर चलने वाले साधक के लिए सबसे बड़ा सत्य यही है "कभी भी, सपने में भी किसी को या किसी चीज़ को 'मेरा' मत मानो।" Shri Premanand Ji Maharaj कहते हैं कि यह 'ममता' ही तीनों लोकों में एकमात्र ऐसी शक्ति है, जो ईश्वर-चिंतन में सबसे बड़ा विक्षेप पैदा करती है। व्यक्ति, वस्तु या स्थान किसी से भी 'मेरा' का भाव जुड़ते ही साधना डगमगाने लगती है।

माया का छल और करुणा का जाल

महाराज जी चेताते हैं कि माया सीधे चुनौती नहीं देती। वह विनम्र बनकर, झुककर आती है और साधक को भ्रम में डाल देती है। कई बार यह छल विकृत करुणा के रूप में सामने आता है। किसी की आँखों के आँसू देखकर साधक उसे "सुधारने" या "बचाने" के प्रयास में अपने सिद्धांत छोड़ देता है। अनुभव बताता है कि अधिकतर पतन इसी गलत दया से होता है। महापुरुष भले ही आत्माओं को गोद में उठाकर ईश्वर तक पहुँचाते हों, पर इसके बदले उन्हें देह-पीड़ा और संसार का अपमान सहना पड़ता है। सामान्य साधक के लिए उचित यही है कि दूर से उपदेश दे, पर अपनी निष्ठा न छोड़े वरना आज की ढील कल का आजीवन पछतावा बन जाती है।

नारियल जैसा हृदय बनाइए

ईश्वर-पथ पर चलने के लिए हृदय बाहर से नारियल की तरह कठोर और भीतर से मीठा होना चाहिए। बाहरी कठोरता संसार की ममता से रक्षा करती है, खासकर तब जब परिवार या मित्र भजन से हटाने लगें। इतिहास गवाह है कि चैतन्य महाप्रभु और आदि शंकराचार्य को भी अपनी दिव्य पुकार पर अडिग रहना पड़ा। संन्यास लेना अनिवार्य नहीं; आवश्यक यह है कि सबकी सेवा करें, पर भीतर से आसक्ति-मुक्त रहें। निरंतर नाम-स्मरण के साथ ऐसा जीवन जीने वाला इसी जन्म में "श्रीराधा के कुंजों" में प्रवेश पा सकता है।

समता की कसौटी

भक्त की पहचान समता है लाभ-हानि, जय-पराजय, सुख-दुख में मन समान रहे। स्वास्थ्य मिले तो प्रसन्न रहें, रोग मिले तो स्वीकारें और कहें "मेरा महबूब जो कुछ भी करता है, वह मुझे अच्छा लगता है।" जिसने देह, मन और वाणी किशोरी जी को समर्पित कर दी, वह चंचल मन की चिंता क्यों करे? वह अब उसका नहीं, उनका है। उड़िया बाबा की तरह अपमान में भी शांत रहकर, आलोचक और स्वयं में एक ही दिव्य आत्मा देखें।

ईर्ष्या सबसे सूक्ष्म विष

अंत में महाराज जी सबसे खतरनाक दोष से सावधान करते हैं मात्सर्य। सोना-वैभव छोड़ना आसान है, पर दूसरे की प्रशंसा या सफलता देखकर उठने वाली जलन त्यागना कठिन। यह विष वर्षों की तपस्या और मित्रता को नष्ट कर देता है। उपाय एक ही है जिससे ईर्ष्या हो, उसे प्रणाम करें, सेवा करें और प्रेम दें। लक्ष्य यही है कि हम प्रभु-कृपा के पात्र बनें। 'मेरा-तेरा' से विरक्ति, समता और ईर्ष्या-त्याग इनसे गुरु-कृपा सबसे अंधेरी नियति भी बदल देती है।

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