Rohini Vrat 2026: 1 अक्तूबर, गुरुवार को जैन समुदाय द्वारा रोहिणी व्रत रखा जा रहा है। यह व्रत रोहिणी नक्षत्र से जुड़ा है और धार्मिक मान्यताओं में रोहिणी व्रत का संबंध संयम, आत्मशुद्धि और आध्यात्मिक साधना से जोड़ा जाता है। कई परिवारों में महिलाएं पति की दीर्घायु और परिवार की सुख-शांति की कामना के लिए भी इस व्रत को करती हैं।
जैन परंपरा में व्रत और उपवास का संबंध केवल भोजन छोड़ने से नहीं, बल्कि संयम, धैर्य, आत्म मंथन, स्वंय पर नियंत्रण और साधना से माना जाता है। रोहिणी व्रत भी इसी परंपरा का हिस्सा है। दरअसल, यह व्रत उस दिन रखा जाता है, जब सूर्योदय के बाद रोहिणी नक्षत्र विद्यमान हो।
2026 के जैन कैलेंडर के अनुसार 1 अक्टूबर 2026, गुरुवार को रोहिणी व्रत है। इसके बाद इस साल में 29 अक्टूबर, 25 नवंबर और 23 दिसंबर को भी रोहिणी व्रत की तिथियां आती हैं। रोहिणी नक्षत्र 27 नक्षत्रों में से एक है। इसी नक्षत्र के आधार पर रोहिणी व्रत का चक्र चलता है। पंचांग के अनुसार यह व्रत आमतौर पर साल में 12 बार आता है। रोहिणी नक्षत्र के दो क्रमों के बीच लगभग 27 दिन का अंतर होता है।
जैन परंपरा में रोहिणी व्रत को संयम और आत्मशुद्धि से जोड़ा जाता है। श्रद्धालु अपनी परंपरा और सामर्थ्य के अनुसार उपवास, पूजा, ध्यान से जुड़ी धार्मिक गतिविधियों में समय देते हैं। कई जैन परिवारों में महिलाएं इस व्रत को पति की लंबी आयु और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना से रखती हैं।
रोहिणी व्रत से जुड़ी एक प्रचलित जैन कथा चंपापुरी के राजा माधवा की पुत्री रोहिणी से जुड़ी है। कथा के अनुसार राजा माधवा की पुत्री रोहिणी का विवाह हस्तिनापुर के राजकुमार अशोक से हुआ। विवाह के बाद एक अवसर पर अशोक की मुलाकात एक मुनिराज से हुई। उन्होंने मुनिराज की पत्नी के शांत स्वभाव का कारण पूछा।
तब मुनिराज ने रोहिणी के पूर्व जन्म की कथा सुनाई। कथा के मुताबिक पूर्व जन्म में रोहिणी का नाम दुर्गंधा था। उसके जीवन में एक पुराने कर्म का प्रभाव बताया गया, जिसके कारण उसे लंबे समय तक कष्ट झेलना पड़ा। वह अपने पिता के साथ मुनिराज के पास गई और दुख से मुक्ति का उपाय पूछा।
मुनिराज ने उसे रोहिणी व्रत करने और धार्मिक साधना का मार्ग बताया। कथा के अनुसार दुर्गंधा ने श्रद्धा और नियम के साथ व्रत किया। आगे चलकर उसके कर्मों का बंधन कम हुआ और अगले जन्म में उसका जन्म रोहिणी के रूप में हुआ। बाद में उसका विवाह राजकुमार अशोक से हुआ।
रोहिणी व्रत को तीन, पांच या सात साल तक रखने की परंपरा है और पांच साल पांच महीने की अवधि को भी एक प्रचलित अवधि माना जाता है। व्रत की समाप्ति पर उद्यापन की जाती है।