

Jitiya Vrat Katha In Hindi: जितिया या जीवित्पुत्रिका का व्रत 3 सितंबर, शनिवार को मनाया जाएगा। संतान की लंबी उम्र और उनके सुखी जीवन की कामना के लिए माताएं जितिया का व्रत रखती है। इस व्रत से कई धार्मिक कथाएं जुड़ी हैं, जिनमें जीमूतवाहन की कथा विशेष रूप से सुनी जाती है। कथा में जीमूतवाहन के त्याग, करुणा और निस्वार्थ भाव का प्रसंग आता है। इसी कारण जितिया व्रत के दौरान इस कथा को सुने जाने की परंपरा है।
मान्य कथा के अनुसार जीमूतवाहन एक धर्मपरायण और दयालु राजकुमार थे। उन्हें दूसरों का दुख देखकर बहुत तकलीफ होती थी और वह जरूरतमंदों की मदद करने के लिए हमेशा तैयार रहते थे।
जीमूतवाहन एक दिन जंगल से गुजर रहे थे, तभी उनकी नजर एक बुजुर्ग नागिन पर पड़ी। वह अपने पुत्र की चिंता में रो रही थी। जीमूतवाहन ने जब उससे दुख का कारण पूछा तो नागिन ने बताया कि नागों के सामने गरुड़ से जुड़ा एक बड़ा संकट था। एक नाग को गरुड़ के सामने बलि के लिए जाना था और इस बार उसके पुत्र की बारी थी। अपने बेटे को खोने के डर से नागिन बेहद दुखी थी। उसकी पीड़ा देखकर जीमूतवाहन का हृदय भी पिघल गया।
जीमूतवाहन ने नागिन को विश्वास दिलाया कि वह उसके पुत्र को कुछ नहीं होने देंगे। उन्होंने तय किया कि नाग के पुत्र की जगह वह खुद गरुड़ के सामने जाएंगे। इसके बाद जीमूतवाहन लाल कपड़े में खुद को ढककर उस स्थान पर जाकर लेट गए, जहां गरुड़ नाग को लेने आने वाले थे। कुछ समय बाद गरुड़ वहां पहुंचे और जीमूतवाहन को नाग समझकर अपने साथ ले जाने लगे।
कथा के अनुसार, जीमूतवाहन ने इस दौरान अपना परिचय नहीं छिपाया और दूसरे के प्राण बचाने के लिए अपने जीवन का बलिदान देने को तैयार रहे।
जब गरुड़ को पता चला कि जिसे वह नाग समझ रहे थे, वह वास्तव में जीमूतवाहन हैं, तो वह उनके साहस और त्याग से प्रभावित हुए। जीमूतवाहन ने गरूड़ से नागों के प्राणों की रक्षा करने का अनुरोध किया। उनकी इस निस्वार्थ भावना से प्रभावित होकर गरुड़ ने नागों को जीवन दान दिया।
जितिया व्रत में जीमूतवाहन को त्याग, करुणा और रक्षा का प्रतीक बताया गया है। जितिया का व्रत संतान की लंबी उम्र और उनकी सुरक्षा की कामना से जुड़ा है। इसलिए इस व्रत के दौरान जीमूतवाहन की कथा सुनने की परंपरा है।
कथा के माध्यम से माताएं संतान की रक्षा और उनके दीर्घ जीवन की कामना करती हैं। वहीं जीमूतवाहन का त्याग इस बात का प्रतीक माना जाता है कि किसी के जीवन की रक्षा के लिए निस्वार्थ भावना का होना आवश्यक है।