Rohini Vrat 2026:13 जून को रोहिणी व्रत का योग, जानिए पूजा विधि और इसकी महिमा

Rohini Vrat 2026 Mahima: रोहिणी व्रत जैन धर्म का एक महत्वपूर्ण व्रत माना जाता है। वर्ष 2026 में 13 जून को रोहिणी व्रत का विशेष योग बन रहा है।आइए जानते हैं रोहिणी व्रत की पूजा विधि और इसकी महिमा।
Rohini Vrat Religious Significance
रोहिणी व्रत (सौ.जैमिनी)
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Rohini Vrat Religious Significance: जैन धर्म में रोहिणी व्रत बड़ा महत्व रखता हैं। यह व्रत हर महीने उस दिन रखा जाता है, जब सूर्योदय के बाद आकाश में रोहिणी नक्षत्र का प्रबल योग होता हैं। यह व्रत जैन धर्म की महिलाएं अपने पति और परिवार की लंबी आयु व सुख‑समृद्धि के लिए रखती हैं। हालांकि, समय के साथ यह व्रत कई हिंदू परिवारों में भी लोकप्रिय हुआ हैं।

रोहिणी व्रत का आध्यात्मिक महत्व

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, रोहिणी नक्षत्र को विशेष शुभ नक्षत्र माना गया है। ज्योतिष शास्त्र में भी इसका महत्व बताया गया है। कहा जाता है कि इस दिन श्रद्धा और नियमों के साथ व्रत एवं पूजा करने से मन को शांति मिलती है और व्यक्ति सकारात्मक सोच की ओर बढ़ता है। जैन परंपरा में इसे आत्मशुद्धि और आध्यात्मिक प्रगति से जोड़कर देखा जाता है।

जून महीने में कब है रोहिणी व्रत?

जून के महीने में रोहिणी व्रत 13 जून 2026, शनिवार को रोहिणी नक्षत्र के शुरू होने पर रखा जाएगा। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, रोहिणी नक्षत्र को विशेष शुभ नक्षत्र है। मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा और नियमों के साथ व्रत एवं पूजा करने से मन शांत होता है। विचारों में सकारात्मकता आती है. जैन परंपरा में ये आत्मशुद्धि और आध्यात्मिक प्रगति का दिन माना जाता है। रोहिणी व्रत व्यक्ति को संयम, अनुशासन और सद्कर्मों की सीख देता है।

ऐसे करें रोहिणी व्रत की पूजा

व्रत के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान किया जाता है। इसके बाद साफ-स्वच्छ कपड़े धारण किए जाते हैं। इसके बाद भगवान वासुपूज्य स्वामी की प्रतिमा या चित्र के सामने पूजा की जाती है। पूजा में चंदन, पुष्प, फल और अन्य पूजन सामग्री अर्पित की जाती है। श्रद्धालु "ॐ ह्रीं श्री वासुपूज्यजिनेन्द्राय नमः" मंत्र का जप भी करते हैं।

दान-पुण्य का महत्व

इस दिन दान-पुण्य को भी महत्वपूर्ण माना गया है। कई लोग अन्न का त्याग कर उपवास रखते हैं, जबकि कुछ श्रद्धालु फलाहार करते हैं। व्रत का समापन अगले दिन निर्धारित समय पर विधि-विधान से किया जाता है।

रोहिणी व्रत केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मसंयम और आध्यात्मिक जागरूकता का भी प्रतीक माना जाता है। व्रत का उद्देश्य आत्मिक शुद्धि और सकारात्मक जीवनशैली को बढ़ावा देना है।

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