Lord Ganesha Origin Story: गणेश चतुर्थी के मौके पर हर घर में भगवान गणेश की पूजा की जाती है। अपने भक्तों के लिए गणपति बप्पा विघ्नहर्ता और मंगलकर्ता हैं। किसी भी शुभ कार्य से पहले गणेश जी का स्मरण किया जाता है। भगवान गणेश प्रथम पूज्य माने जाते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि भगवान गणेश की उत्पत्ति कैसे हुई और उन्हें हाथी का सिर कैसे मिला?
भगवान गणेश के जन्म और उनके गजानन रूप को लेकर पुराणों और अलग-अलग परंपराओं में अलग-अलग कथाएं प्रचलित हैं। आइए जानते हैं गणेश जी की उत्पत्ति से जुड़ी प्रमुख मान्यताएं।
मान्यता है कि गणपति को भगवान शिव के गणों यानी उनके दूतों का स्वामी कहा जाता है। आगे चलकर उन्हें शिव के गणों का प्रमुख माना गया और इसी वजह से उनका नाम गणपति पड़ा। समय के साथ भक्तों ने उन्हें भगवान शिव और माता पार्वती के पुत्र तथा भगवान कार्तिकेय के भाई के रूप में पूजना शुरु किया।
एक मान्यता के अनुसार, भगवान गणेश का जन्म माता पार्वती के गर्भ से नहीं हुआ। भगवान शिव ने अपनी शक्ति से एक तेजस्वी बालक को उत्पन्न किया। जब माता पार्वती ने उस सुंदर बालक को देखा तो उन्हें इस बात पर आश्चर्य हुआ कि शिव ने उनके बिना ही पुत्र को जन्म दिया। कथा के अनुसार, इसके बाद उन्होंने बालक को ऐसा श्राप दिया जिससे उसका स्वरूप बदल गया और उसका सिर हाथी के समान हो गया। इस तरह गणेश जी को गजानन यानी हाथी के मुख वाले देवता के रूप में जाना गया।
भगवान गणेश के जन्म की सबसे प्रसिद्ध कथाओं में से एक माता पार्वती के स्नान से जुड़ी है। कहा जाता है कि एक बार माता पार्वती स्नान करने जा रही थीं। उन्होंने अपने शरीर के उबटन से एक बालक की आकृति बनाई और उसमें प्राण डाल दिए। इसके बाद उन्होंने उस बालक को अपने द्वार पर पहरा देने के लिए कहा और निर्देश दिया कि उनकी अनुमति के बिना किसी को अंदर न आने दिया जाए।
कुछ समय बाद भगवान शिव वहां पहुंचे। गणेश जी ने उन्हें भी अंदर जाने से रोक दिया। इससे शिव क्रोधित हो गए और दोनों के बीच संघर्ष हुआ। कथा के अनुसार, शिव ने क्रोध में बालक का सिर काट दिया।
जब माता पार्वती को इसकी जानकारी हुई तो वह बहुत क्रोधित हुई। उन्हें शांत करने के लिए भगवान शिव ने बालक को फिर से जीवित करने का वचन दिया। इसके बाद हाथी का सिर उसके धड़ से जोड़ा गया और वह बाल गणेश कहलाए।
एक अन्य कथा में गणेश जी के सिर से जुड़ी घटना को शनि भगवान से जोड़ा जाता है। कथा के अनुसार, माता पार्वती ने शनि देव से गणेश जी को देखने के लिए कहा। शनि देव ने अपनी दृष्टि के प्रभाव के कारण गणेश जी की ओर देखा और उनकी दृष्टि पड़ते ही गणेश जी का सिर शरीर से अलग हो गया।
माता पार्वती इस घटना से बेहद दुखी हो गईं। इसके बाद उन्होंने भगवान ब्रह्मा से सहायता मांगी। ब्रह्मा जी ने उन्हें ऐसे प्राणी का सिर लाने को कहा, जो रास्ते में सबसे पहले दिख जाए। कथा के अनुसार, माता पार्वती को सबसे पहले हाथी दिखाई दिया। उसका सिर लाकर गणेश जी के शरीर से जोड़ा गया और वह फिर जीवित हो गए। इसी वजह से उनका नाम गजानन पड़ा।
एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार भगवान शिव और माता पार्वती हिमालय क्षेत्र में विचरण कर रहे थे। वहां उन्होंने हाथियों के एक जोड़े को देखा। इसके बाद शिव और पार्वती ने स्वयं हाथी का रूप धारण किया। इसी रूप से उन्हें एक ऐसे पुत्र की प्राप्ति हुई जिसका चेहरा हाथी के समान था। यही पुत्र आगे चलकर गणपति के नाम से जाना गया।
गणपति के हाथी के चेहरे को लेकर एक अलग कहानी के अनुसार, प्राचीन समय में अलग-अलग जनजातियों और समुदायों में पशु-मुखौटा पहनने की परंपरा थी। इन परंपराओं में हाथी के मुख वाले मुखौटे भी शामिल थे। समय के साथ अलग-अलग स्थानीय देवी-देवताओं से गणपति के गजानन स्वरूप की कल्पना की गई होगी।
एक अन्य वर्णन में स्पष्ट किया गया है कि भगवान शिव के गण और विनायक नाम का उल्लेख प्राचीन देवताओं से जुड़ा है। देवताओं और हाथियों से जुड़े प्रतीकों के कारण आगे चलकर विनायक और गणपति को गजानन यानी हाथी के चेहरे वाले देवता के रूप में पूजा जाने लगा।