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भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह की एक ऐसी कथा जो शायद आपने नहीं सुनी होगी, यहां पढ़िए
Shiv Parvati Prem Katha:शिव और पार्वती का विवाह तप, श्रद्धा और दिव्य प्रेम का प्रतीक है। पार्वती की कठोर साधना से प्रसन्न होकर शिव ने उन्हें अर्धांगिनी रूप में स्वीकार किया।
- Written By: सीमा कुमारी

शिव-पार्वती विवाह की पावन कथा (सौ.सोशल मीडिया)
Shiv Parvati Vivah Katha in Hindi:शिव की आराधना का महापर्व महाशिवरात्रि कल 15 फरवरी 2026 को मनाई जा रही है। महाशिवरात्रि पर्व को लेकर मान्यता है कि इसी दिन शिव-पार्वती का विवाह संपन्न हुआ था, इसलिए इस दिन उनकी पूजा करने से सुखद दांपत्य जीवन का आशीर्वाद मिलता है।
इस अवसर पर हम आपको बता रहे हैं शिव पार्वती के विवाह की संपूर्ण व्रत कथा। महाशिवरात्रि के व्रत में इसको पढ़ने से आपको शिव-पार्वती का आशीर्वाद मिलता है और आपके वैवाहिक जीवन में खुशहाली बढ़ती है।
शिव-पार्वती विवाह की पावन कथा
भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह केवल एक दैवी प्रसंग नहीं, बल्कि भक्ति, तपस्या, संयम और सृष्टि संतुलन का अद्भुत प्रतीक है। शिव बिना शक्ति “शव” हैं और शक्ति बिना शिव “निष्प्रभावी” दोनों का मिलन ही सृष्टि का आधार है।
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सती का आत्मत्याग और शिव का वैराग्य
प्रथम जन्म में माता पार्वती, दक्षप्रजापति की पुत्री सती थीं। उन्होंने शिव को पति रूप में प्राप्त किया, किंतु उनके पिता दक्ष शिवजी का अपमान करते थे। एक यज्ञ में शिव को आमंत्रित नहीं किया गया। सती वहाँ पहुँचीं और पति का अपमान देखकर वेदना से व्याकुल होकर योगाग्नि में देह त्याग दी।
यह देखकर शिव अत्यंत क्रोधित हुए। उन्होंने वीरभद्र को उत्पन्न कर यज्ञ का विध्वंस कराया। इसके बाद वे संसार से विरक्त होकर गहन समाधि में लीन हो गए।
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पार्वती का पुनर्जन्म और कठोर तप
कालांतर में सती ने हिमवान और माता मैना के घर पार्वती रूप में जन्म लिया। बचपन से ही उन्हें ज्ञात था कि उनका जीवन शिव के लिए समर्पित है।
नारद मुनि के मार्गदर्शन में उन्होंने कठोर तप किया—
पहले केवल फलाहार, फिर पत्तों पर निर्वाह (इसलिए नाम पड़ा “अपर्णा”),
अंत में अन्न-जल त्यागकर वायु पर जीवनयापन।
उनकी अटल भक्ति से देवता भी चकित थे।
कामदेव दहन
देवताओं को भय था कि शिव के वैराग्य से सृष्टि का संतुलन बिगड़ जाएगा। उन्होंने कामदेव को शिव का ध्यान भंग करने भेजा। कामदेव ने पुष्पबाण चलाया, किंतु शिव ने क्रोधित होकर तीसरा नेत्र खोल दिया और कामदेव भस्म हो गए। फिर भी पार्वती की भक्ति अडिग रही।
शिव ने ब्राह्मण बालक (बटु) का वेश धारण कर पार्वती की परीक्षा ली। उन्होंने शिव की निंदा करते हुए कहा कि वे भस्मधारी, श्मशानवासी और अलौकिक हैं।
पार्वती मुस्कराकर बोलीं “वे केवल भस्मधारी नहीं, त्रिलोकीनाथ हैं। वही मेरे आराध्य हैं।”उनकी अटल श्रद्धा देखकर शिव अपने दिव्य स्वरूप में प्रकट हुए और विवाह के लिए सहमत हो गए।
अद्भुत बारात और दिव्य विवाह
विवाह का दिन आया। शिव की बारात अनोखी थी— नंदी बैल पर सवार शिव, गले में सर्प, शरीर पर भस्म, संग में भूत-प्रेत और गण। यह रूप देखकर माता मैना घबरा गईं।
तब शिव ने सुंदर, तेजस्वी “चंद्रशेखर” स्वरूप धारण किया। देवता, ऋषि, गंधर्व, अप्सराएँ सब उपस्थित हुए।
भगवान विष्णु ने कन्यादान किया और ब्रह्मा ने मंत्रोच्चार किया। अग्नि को साक्षी मानकर सप्तपदी हुई और पुष्पवर्षा के बीच विवाह संपन्न हुआ।
महाशिवरात्रि का आध्यात्मिक महत्व
मान्यता है कि इसी पावन रात्रि में मध्यरात्रि के समय शिव-पार्वती का विवाह हुआ था। इसलिए महाशिवरात्रि पर जागरण, व्रत और पूजन करने से अखंड सौभाग्य, वैवाहिक सुख और मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है।
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