Indira Ekadashi Vrat Katha: सनातन धर्म में इंदिरा एकादशी का व्रत पितरों की आत्मा की शांति और उन्हें मोक्ष दिलाने वाला सबसे उत्तम व्रत माना गया है।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, महाभारत काल में भगवान श्री कृष्ण ने खुद धर्मराज युधिष्ठिर को इस व्रत का महत्व बताते हुए एक कथा सुनाई थी। आइए जानते हैं कि राजा इंद्रसेन ने कैसे इस पावन व्रत को रखकर अपने पिता को यमलोक के कष्टों से उबारा था।
सत्ययुग की बात है, माहिष्मती नाम की एक बहुत ही सुंदर और समृद्ध नगरी हुआ करती थी। वहाँ इंद्रसेन नाम के एक प्रतापी राजा शासन करते थे। राजा इंद्रसेन भगवान विष्णु के परम भक्त, धर्म का पालन करने वाले और अपनी प्रजा को अपनी संतान की तरह मानने वाले राजा थे। उनका राज्य धन-धान्य, सुख और शांति से भरा हुआ था। राजा अपनी रानी, बच्चों और प्रजा के साथ खुशी-खुशी भगवान की भक्ति में समय बिता रहे थे।
एक दिन जब राजा इंद्रसेन अपनी राजसभा में बैठे थे, तभी वहाँ देवर्षि नारद पधारे। राजा ने बहुत आदर-सत्कार के साथ नारद जी का स्वागत किया और उनके आने की वजह पूछी। तब नारद जी ने कहा, "हे राजन! कुछ समय पहले मैं यमलोक गया था। वहाँ मैंने यमराज की सभा में तुम्हारे स्वर्गीय पिता को बैठे देखा। वे अपने पूर्व जन्म की किसी भूल या अधूरी साधना के कारण यमलोक में ही निवास कर रहे हैं।"
नारद जी ने आगे बताया कि तुम्हारे पिता ने मेरे जरिए तुम्हारे लिए एक संदेश भेजा है। उन्होंने कहा है कि यदि उनका पुत्र इंद्रसेन आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की इंदिरा एकादशी का व्रत रखे और उसका पुण्य उन्हें दान कर दे, तो उन्हें यमलोक के दुखों से मुक्ति मिल जाएगी और वे सीधे बैकुंठ धाम चले जाएंगे।
अपने पिता के यमलोक में कष्ट सहने की बात सुनकर राजा इंद्रसेन बेहद दुखी और व्याकुल हो गए। उन्होंने हाथ जोड़कर नारद जी से प्रार्थना की और कहा कि हे देवर्षि! कृपया मुझे इस एकादशी व्रत की पूरी पूजा विधि बताइए, ताकि मैं अपने पिता को इस कष्ट से बाहर निकाल सकूं। तब नारद जी ने उन्हें सांत्वना दी और तरीका बताया। नारद जी ने कहा कि तुम आश्विन कृष्ण पक्ष की दशमी के दिन श्रद्धा से पितरों का श्राद्ध करना और एकादशी के दिन पूरा उपवास रखना। इसके बाद द्वादशी तिथि को भगवान विष्णु की पूजा करने के बाद अपने व्रत का सारा पुण्य अपने पिता के नाम दान कर देना।
देवर्षि नारद के बताए अनुसार, अश्विन मास की एकादशी आने पर राजा इंद्रसेन ने पूरी श्रद्धा और विधि-विधान से व्रत रखा। उन्होंने बिना कुछ खाए-पिए भगवान ऋषिकेश की पूजा की, दोपहर में पितरों का तर्पण किया और रातभर जागकर हरि-कीर्तन किया।
अगले दिन द्वादशी को राजा ने ब्राह्मणों को आदरपूर्वक भोजन कराया, दान-दक्षिणा दी और हाथ में जल लेकर संकल्प किया कि "मेरे इस इंदिरा एकादशी व्रत का जो भी पुण्य है, वह मेरे पिता को प्राप्त हो।" राजा के पुण्य दान करते ही आकाश से फूलों की बारिश होने लगी। राजा के पिता यमलोक के कष्टों से मुक्त होकर एक दिव्य विमान में सवार हुए और बैकुंठ धाम चले गए। इस पुण्य के प्रभाव से राजा ने भी लंबे समय तक सुख से राज किया और अंत में उन्हें भी बैकुंठ लोक मिला।
यह पौराणिक कथा हमें सिखाती है कि संतान का यह सबसे बड़ा धर्म है कि वह अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए प्रयास करे। इंदिरा एकादशी का व्रत रखने से न केवल व्रत करने वाले व्यक्ति के सारे पाप मिट जाते हैं, बल्कि पीढ़ियों से कष्ट भोग रहे पितरों का भी हमेशा के लिए उद्धार हो जाता है।