Teej Par Jhula Jhoolne Ka Mahatva : आज हरियाली तीज का पर्व मनाया जा रहा है। यह पर्व मुख्य रूप से सुहागिन महिलाओं का पर्व है। जिसे सुहागिन महिलाएं पति की लंबी उम्र और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना से निर्जला व्रत रखकर श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाती हैं। हरियाली तीज पर भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करने के साथ झूला झूलने की परंपराएं भी जो सदियों से चली आ रही हैं। इस दिन महिलाएं पेड़ों पर झूला डालकर झूलती हैं और उत्सव मनाती हैं।
आज के दौर में इसका चलन और ज्यादा बढ़ गया है। सावन के महीने में जब चारों ओर हरियाली छा जाती है, तब हाथों में मेहंदी लगाए हुए लड़कियां एक-दूसरे को झूला झुलाती हैं और इस उत्सव का आनंद उठाती हैं। आइए जानते हैं हरियाली तीज पर झूला झूलने का धार्मिक महत्व क्या है?
धर्म शास्त्रों में हरियाली तीज के दिन झूला झूलने की परंपरा के पीछे कुछ मुख्य धार्मिक कारण बताए जाते हैं जिसकी वजह से सदियों से चली आ रही यह परंपरा आज भी कायम है।
हरियाली तीज को माता पार्वती और भगवान शिव के पुनर्मिलन का दिन माना जाता है। ऐसा कहा जाता है कि मां पार्वती ने कठोर तपस्या के बाद इसी दिन शिव जी को पति के रूप में प्राप्त किया था। इसकी खुशी में समस्त देवियों और सखियों ने झूला झूलकर इसे उत्सव की तरह मनाया था। भगवान शिव और पार्वती के इस मिलन को आज भी लोग हर्ष और उल्लास में मनाते हैं और एक दूसरे को ख़ुशी से झूला झुलाते हैं।
जैसा कि जानते है कि, सावन महीने में चारों तरफ हरियाली छा जाती हैं। पेड़ों पर झूला डालकर झूलना प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने और उसकी सुंदरता का आनंद लेने का एक पारंपरिक तरीका माना जाता हैं।
यह व्रत सुहागिन स्त्रियों के लिए सबसे पवित्र व्रतों में से एक माना जाता हैं। इस दिन माता पार्वती को 16 श्रृंगार की सामग्री अर्पित की जाती हैं।
ऐसा कहा जाता है कि, इस दिन जो भी महिला विधि-विधान से भगवान शिव और माता पार्वती का पूजन करती है, उसके जीवन से वैवाहिक कलह दूर होती है और दांपत्य जीवन में मधुरता आती हैं।
सांस्कृतिक रूप से, झूला झूलना मन की चंचलता और विचारों के संतुलन का प्रतीक माना जाता है। जिस तरह झूला झुलाने पर यह आगे और पीछे जाता है, उसी तरह जीवन में आने वाले सुख-दुख के उतार-चढ़ाव में संतुलन बनाए रखना भी जरूरी है जिससे आगे चलकर जीवन में खुशहाली बनी रहे।