Dhanteras Pauranik Katha: हिंदू धर्म में धनतेरस का पर्व विशेष महत्व है। धनतेरस का पर्व सुख-समृद्धि, आरोग्य और धन-वैभव का प्रतीक माना जाता है। धनतेरस पर भगवान धन्वंतरि, माता लक्ष्मी और भगवान कुबेर की पूजा का विशेष महत्व है।
हिन्दू धर्म में सभी लोग धनतेरस के दिन व्रत रखते है और सुख-समृद्धि के लिए विधि-विधान से मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा करते है। साल 2026 में धनतेरस का पर्व 6 नवंबर को मनाया जा रहा है। हम सभी लोग धनतेरस तो मना रहे है, लेकिन क्या आप जानते है धनतेरस क्यों मनाया जाता है? आइए जानते हैं धनतेरस से जुड़ी पौराणिक कथाएं और इसका धार्मिक महत्व…
धनतेरस से जुड़ी तीन पौराणिक कथाएं अत्यधिक प्रसिद्ध हैं- भगवान धन्वंतरि के प्रकट होने की कथा, यमदीपदान की कथा और माता लक्ष्मी और किसान की कथा-
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को समुद्र मंथन हुआ था। इसी दौरान भगवान धन्वंतरि हाथों में अमृत कलश लिए प्रकट हुए थे। भगवान धन्वंतरि को भगवान विष्णु का अंश माना जाता है।
भगवान धन्वंतरि को आयुर्वेद और आरोग्य का देवता भी माना जाता है। भगवान धन्वंतरि हाथों में अमृत कलश लिए प्रकट हुए इसलिए धनतेरस के दिन बर्तन और धातुओं की खरीदारी करने की परंपरा शुरू हुई। इसलिए धनतेरस के दिन पीतल, तांबा या कांसे के बर्तन खरीदना शुभ माना जाता है।
पौराणिक कथाओ के अनुसार प्राचीन काल में राजा हिम के यहां जब पुत्र का जन्म हुआ तब ज्योतिषियों ने भविष्यवाणी कर दी थी कि विवाह के ठीक चौथे दिन सांप के डसने से राजकुमार की मृत्यु हो जाएगी। लेकिन राजकुमार का विवाह हुआ, तो उनकी बुद्धिमान और धर्मपरायण पत्नी ने उन्हें चौथे दिन की रात को सोने नहीं दिया था।
राजकुमार की पत्नि ने शयनकक्ष के द्वार पर ही ढेर सारे सोने-चांदी के आभूषण और सिक्के रख दिए और बहुत सारे दीए जला दिए जिससे चारों तरफ उजाला ही फैल गया। इस दौरान वह कहानियां सुनाती और गीत भी गाती।
जब यमराज सांप का रूप धारण कर राजकुमार के प्राण लेने आए, तब दीपों की तेज रोशनी और आभूषणों की चमक के कारण उनकी आंखें चौंधिया गईं और यमराज कमरे के अंदर प्रवेश नहीं कर सके।
इतना ही नहीं यमराज सोने के सिक्कों के ढेर पर बैठकर सुबह तक गाने और कहानियां सुनते रहे और फिर चुपचाप अपने लोक लौट गए। इस प्रकार राजकुमार की पत्नि ने उनकी जान बचा ली। तभी से धनतेरस के दिन यमराज के प्रकोप और अकाल मृत्यु से बचने के लिए यम दीपदान करने की परंपरा शुरू हुई।
पौराणिक कथाओ के अनुसार, एक बार माता लक्ष्मी को किसी श्राप के कारण 12 वर्षों तक एक किसान के घर में रहना पड़ा था। लेकिन उस दौरान मां लक्ष्मी के किसान के घर में रहने से किसान का घर धन-धान्य से भर गया।
किसान धन-धान्य से अत्यंत समृद्ध हो गया। लेकिन जब 12 जब 12 वर्ष पूरे होने पर माता लक्ष्मी जाने लगी तब किसान ने उन्हें रोकने के लिए विनती की। तब माता लक्ष्मी ने किसान से कहा कि कार्तिक मास की त्रयोदशी की रात को तुम अपने घर की अच्छी तरह साफ-सफाई करना और घी का दीपक जलाना फिर तांबे के कलश में सिक्के रखकर मेरी पूजा करना।
किसान ने वैसा ही किया जैसा मां लक्ष्मी ने कहा था। इसलिए उसका घर पूरे वर्ष धन-धान्य और समृद्धि से भरा रहा। तभी से धनतेरस पर माता लक्ष्मी के पूजा का विधान है।