

धनतेरस के दिन यमराज के नाम से दीपक जलाने की परंपरा है।
इस दीपक को यम दीपम या यम दीपदान कहा जाता है।
मान्यता के अनुसार, यम दीपम घर के मुख्य द्वार के बाहर दक्षिण दिशा की ओर रखा जाता है।
इसे परिवार की सुख-शांति और अच्छे स्वास्थ्य की कामना के लिए जलाया जाता है।
यम दीपदान धनतेरस की एक खास धार्मिक परंपरा है।
Yam Deepak Jalane Ke Niyam: धनतेरस के दिन घरों में दीपक जलाने की विशेष परंपरा है। इस दिन भगवान धन्वंतरि और मां लक्ष्मी की पूजा के साथ यमराज के नाम से भी दीप जलाया जाता है, जिसे यम दीपम या यम दीपदान कहा जाता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यह दीपक परिवार की सुख-शांति, अच्छी सेहत और मंगलकामना का प्रतीक माना जाता है। ऐसे में कई लोगों के मन में सवाल होता है कि यम दीपम किस दिशा में रखना चाहिए और इसे जलाने की सही परंपरा क्या है।
पारंपरिक मान्यता के अनुसार, यम दीपम घर के मुख्य द्वार के बाहर दक्षिण दिशा की ओर रखकर जलाया जाता है। हिंदू धार्मिक परंपरा में दक्षिण दिशा को यमराज की दिशा माना गया है। इसलिए इस दिशा में दीपदान करने की परंपरा प्रचलित है। हालांकि, अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में इसे करने के तरीके में थोड़ा अंतर हो सकता है।
धनतेरस पर यमराज के नाम से दीप जलाने की परंपरा जीवन की मंगलकामना और परिवार की कुशलता से जुड़ी है। मान्यता है कि इस दिन दीपदान करने से यमराज प्रसन्न होते हैं और परिवार पर अपनी कृपा बनाए रखते हैं। यह परंपरा जीवन के प्रति सम्मान और अपने परिवार की सलामती की प्रार्थना का प्रतीक भी मानी जाती है।
यम दीपम के लिए आमतौर पर मिट्टी का दीपक इस्तेमाल किया जाता है। इसमें सरसों का तेल या घी और रूई की बत्ती रखी जाती है। कुछ परिवारों में चौमुखी दीपक जलाने की परंपरा भी है, जबकि कई जगह साधारण मिट्टी के दीपक से ही दीपदान किया जाता है। इसमें परिवार की परंपरा के अनुसार सामग्री का चुनाव किया जा सकता है।
धनतेरस की शाम स्नान के बाद घर के मुख्य द्वार को साफ करें। इसके बाद दीपक में तेल या घी डालकर बत्ती जलाएं और उसे दक्षिण दिशा की ओर रखें। इस दौरान यमराज का स्मरण करते हुए परिवार की सुख-शांति और अच्छे स्वास्थ्य की कामना करें। दीपक को सुरक्षित स्थान पर रखें, ताकि उससे किसी तरह की परेशानी न हो।
यम दीपम जलाते समय साफ-सफाई और सुरक्षा का ध्यान रखना जरूरी है। दीपक ऐसी जगह रखें जहां हवा से वह आसानी से बुझ न जाए और आग लगने का खतरा भी न हो। इस परंपरा को श्रद्धा और अपनी पारिवारिक मान्यताओं के अनुसार निभाया जा सकता है। इसका मुख्य भाव परिवार की मंगलकामना और दीपावली के पर्व पर सकारात्मकता का स्वागत करना है।