Shri Premanand Ji Maharaj (Source. Pinterest) 
धर्म

सब कुछ होते हुए भी खाली क्यों है जीवन? प्रेमानंद जी महाराज ने बताया असली बल का रहस्य

Power, Grihastha Dharma: मानव जीवन कोई साधारण अवसर नहीं, बल्कि "अंतिम अवसर" है। लेकिन विडंबना यह है कि हम इस अनमोल जीवन को माया, दिखावे और सांसारिक मोह-ममता में गंवा रहे हैं।

सिमरन सिंह

Vrindavan Glory: मानव जीवन कोई साधारण अवसर नहीं, बल्कि "अंतिम अवसर" है। लेकिन विडंबना यह है कि हम इस अनमोल जीवन को माया, दिखावे और सांसारिक मोह-ममता में गंवा रहे हैं। श्री प्रेमानंद जी महाराज कहते हैं कि हम अपना तन, मन और प्राण उन रिश्तों और शरीरों पर न्योछावर कर देते हैं, जो अंततः मिट्टी में मिल जाने वाले हैं। यदि मनुष्य अपने भीतर छिपे आध्यात्मिक बल को पहचान ले, तो वह केवल अपना ही नहीं, बल्कि अपनी आने वाली 21 पीढ़ियों और पूरे मृत्यु लोक का कल्याण कर सकता है।

संसार: एक अंधा कुआँ

महाराज जी इस संसार को "अंधे कुएँ" की संज्ञा देते हैं, जहाँ गिरने के बाद कुछ दिखाई नहीं देता, केवल विनाश ही शेष रहता है। वे कहते हैं कि काल रूपी सर्प हमें पहले ही जकड़ चुका है। हमारी उम्र के 40-50-60 वर्ष तो वह पहले ही निगल चुका है, अब केवल अंतिम ग्रास बाकी है। दुख की बात यह है कि हम यह समझ ही नहीं पा रहे कि हम कौन हैं, कहाँ से आए हैं और जीवन का वास्तविक लक्ष्य क्या है। हम भीड़ के पीछे भागते जा रहे हैं, जहाँ सिर्फ मकान, गाड़ी और दिखावे की बातें हैं, भगवत प्राप्ति की नहीं।

पाप की कमाई: खीर में मिला विष

एक कठोर चेतावनी देते हुए श्री प्रेमानंद जी महाराज कहते हैं कि पाप से कमाया गया धन विनाश का कारण बनता है। वे उदाहरण देते हैं यदि कोई आपको स्वादिष्ट खीर दे, लेकिन कोई विश्वसनीय व्यक्ति कह दे कि उसमें विष मिला है, तो क्या आप उसे खाएँगे? ठीक उसी तरह अधर्म और निर्दयता से कमाया गया धन वह विष है, जो पूरे परिवार और संतान का सर्वनाश कर देता है। जो लोग आज गलत रास्ते से आगे बढ़ते दिख रहे हैं, वह केवल उनकी अंतिम इच्छा की पूर्ति है, इसके बाद सर्वनाश का तांडव निश्चित है।

गृहस्थ जीवन: भगवत प्राप्ति का सुगम मार्ग

महाराज जी स्पष्ट करते हैं कि गृहस्थ धर्म कोई छोटा धर्म नहीं। स्वयं भगवान ने भी गृहस्थ घरों में अवतार लिया है। यदि कोई व्यक्ति ईमानदारी से मेहनत करे, पाप से बचे और अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए प्रभु का नाम जपे, तो उसे निश्चित रूप से भगवत प्राप्ति होती है। नारद जी और भगवान के संवाद का उल्लेख करते हुए महाराज कहते हैं कि जो गृहस्थ हजारों जिम्मेदारियों के बीच भी प्रभु को स्मरण करता है, वह उन विरक्तों से भी श्रेष्ठ हो सकता है जो एकांत में भजन करते हैं।

परम औषधि: सत्संग और श्री धाम वृंदावन

इस मोह-जाल को काटने के लिए सत्संग एक कैंची के समान है। महाराज जी कहते हैं कि विदेश घूमने और दिखावे पर धन खर्च करने के बजाय, तीर्थ और श्री धाम वृंदावन जैसे पावन स्थलों की यात्रा करें। अतिरिक्त धन को संत सेवा, नाम-कीर्तन और दीन-दुखियों की सहायता में लगाएं, यही सच्ची कमाई है।

ध्यान दें

असंख्य जन्म व्यर्थ चले गए, अब इस मानव जीवन को व्यर्थ न जाने दें। चाहे आप किसान हों या रिक्शा चालक, यदि हृदय में राधा राधा का नाम है और जीवन सत्य के मार्ग पर है, तो आपका जीवन धन्य है। पाप से बचें, धर्म पर चलें और निरंतर नाम जप करें यही अंधकार से प्रकाश की ओर जाने का एकमात्र मार्ग है।

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