Aja Ekadashi Vrat Katha 2026: भाद्रपद कृष्ण पक्ष की एकादशी को अजा एकादशी कहा जाता है। एकादशी के व्रत को श्रद्धा और विधि-विधान से करने से व्यक्ति को पापों से मुक्ति मिलती है और भगवान श्रीहरि विष्णु की कृपा प्राप्त होती है।
अजा एकादशी की कथा सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र से जुड़ी हुई है। कहते हैं राजा ने अपने जीवन में इतना बड़ा संकट झेला कि उन्हें राजपाट के साथ पत्नी और पुत्र तक से अलग होना पड़ा, लेकिन उन्होंने सत्य का साथ नहीं छोड़ा।
7 सितंबर 2026 को अजा एकादशी का व्रत रखा जाएगा और व्रत का पारण 8 सितंबर को होगा। जानिए राजा हरिश्चंद्र से जुड़ी अजा एकादशी की कथा।
कथा के अनुसार, एक बार युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से भादो मास के कृष्ण पक्ष में पड़ने वाली एकादशी के बारे में पूछा। श्रीकृष्ण ने बताया कि इस एकादशी का नाम अजा एकादशी है। इसे पापों का नाश करने वाली और पुण्य प्रदान करने वाली माना गया है।
राजा हरिश्चंद्र सत्यवादी और अपने वचन को हर मूल्य पर निभाने के लिए जाने जाते थे। कथा के अनुसार, एक बार स्वप्न में उन्हें महर्षि विश्वामित्र दिखाई दिए और राजा ने सपने में ही अपना पूरा राजपाट दान करने का वचन दे दिया।
अगले दिन जब विश्वामित्र ने अपना राज्य मांगा तो हरिश्चंद्र ने बिना किसी संकोच के अपना वचन निभाया और राजपाट उन्हें सौंप दिया। इसके बाद राजा के जीवन में कठिनाइयों का दौर शुरू हुआ।
राजपाट चले जाने के बाद भी राजा की परेशानियां खत्म नहीं हुईं। उन्हें अपनी पत्नी और पुत्र तक को बेचना पड़ा। इसके बाद उन्हें चांडाल की दासता स्वीकार करनी पड़ी और श्मशान में मुर्दों के कफन का काम करना पड़ा। इतने कठिन हालात के बावजूद भी राजा हरिश्चंद्र सत्य के मार्ग पर चलते रहे। कई वर्षों तक इसी तरह जीवन बिताने के बाद वह बेहद दुखी और चिंतित रहने लगे। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि इस संकट से बाहर निकलने के लिए क्या किया जाए।
जब राजा हरिश्चंद्र दुख में डूबे हुए थे, तभी वहां महर्षि गौतम पहुंचे। राजा ने उन्हें प्रणाम किया और अपने जीवन की सारी समस्याएं बताईं। राजा की स्थिति सुनकर महर्षि गौतम ने उन्हें भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अजा एकादशी का व्रत करने की सलाह दी।
महर्षि गौतम की बात मानकर राजा हरिश्चंद्र ने विधि-विधान से अजा एकादशी का व्रत किया और रात में जागरण किया।, इस व्रत के प्रभाव से राजा के जीवन के सारे दुख दूर होने लगे। उन्हें अपनी पत्नी का साथ वापस मिला और उनके पुत्र को भी जीवन प्राप्त हुआ। इतना ही नहीं, राजा हरिश्चंद्र को अपना खोया हुआ राज्य भी वापस मिल गया। बाद में वह अपने परिवार और प्रजा के साथ स्वर्गलोक को चले गए।
कथा के अंत में बताया गया है कि जो व्यक्ति अजा एकादशी की कथा सुनता या पढ़ता है, उसे अश्वमेध यज्ञ के समान फल प्राप्त होता है। इसी कारण इस एकादशी को श्रद्धापूर्वक करने और इसकी कथा सुनने का विशेष महत्व होता है।