विवादमुक्त समितियां नाम मात्र की (सौजन्यः सोशल मीडिया) 
यवतमाल

विवादमुक्त समितियां नाम मात्र की, यवतमाल के ग्रामीणों में बढ़ती नाराज़गी

Vivadmukt Committees Yavatmal: यवतमाल के ग्रामीण क्षेत्रों में विवादमुक्त समितियाँ कागज़ों पर सीमित है। कार्य बंद होने से ग्रामीणों में नाराज़गी बढ़ी। अभियान के पुनर्जीवन की मांग तेज हो गई है।

आंचल लोखंडे

Yavatmal News: ग्रामीण स्तर पर विवादों को सुलझाने और सामाजिक सौहार्द बनाए रखने के लिए शुरू की गई विवादमुक्त समितियां अब केवल नाम के फलक तक सीमित होकर रह गई हैं। वर्ष 2000 में राज्य सरकार ने महात्मा गांधी विवादमुक्त ग्राम अभियान की शुरुआत की थी, जिसके तहत गांवों में छोटे-मोटे विवादों का सामंजस्यपूर्ण निपटारा कर पुलिस व न्यायालय के झमेले कम करने का उद्देश्य था।

लेकिन ज़मीनी हकीकत इससे बिल्कुल उलट है। तालुके के अधिकांश गांवों में समितियों का कामकाज पूरी तरह ठप पड़ा है। कई जगह अध्यक्ष और सदस्यों के नाम बोर्ड पर दर्ज हैं, मगर समिति वास्तव में कब और कहाँ बैठती है, इस बारे में किसी को जानकारी नहीं है। इसी कारण ग्रामीणों में नाराज़गी लगातार बढ़ती जा रही है।

ज़िम्मेदारियाम निर्धारित

विवादमुक्त समितियों के माध्यम से गांवों में विवादों का तुरंत समाधान, पारस्परिक समझौते और सामाजिक सौहार्द बढ़ाने जैसी ज़िम्मेदारियाम निर्धारित की गई थीं। एक समय ऐसा भी था जब कई गाँव इस अभियान में उत्कृष्ट कार्य करते हुए राज्यस्तरीय पुरस्कार भी जीत चुके थे। लेकिन बीते कुछ वर्षों में यह व्यवस्था पूरी तरह उपेक्षित हो गई है और विवादमुक्त गाँवों की संख्या लगातार घटती चली गई है।

नीतियों में बदलाव, पदाधिकारियों की उदासीनता तथा प्रशासनिक स्तर पर निगरानी के अभाव के कारण अधिकांश समितियाँ केवल कागज़ों में ही सक्रिय नज़र आती हैं। जिलाधिकारी की अध्यक्षता वाली समिति में अन्नसुरक्षा, शिक्षण, पुलिस, महसूल समेत कई विभागों के अधिकारी सदस्य होने के बावजूद ज़मीनी स्तर पर कोई ठोस परिणाम दिखाई नहीं देता।

तंटामुक्त गांव-अब केवल याद भर

ग्रामीणों का आरोप है कि तालुके में केवल चुनिंदा गाँवों में दिखावे के लिए ही समितियाँ चलाई जा रही हैं। भले ही अभिलेखों में समितियाँ सक्रिय दर्शाई जाती हों, मगर गाँववालों को इसका कोई प्रत्यक्ष लाभ नहीं मिल रहा। कभी सामाजिक आंदोलन का स्वरूप लेने वाली यह पहल अब सिर्फ़ नाम मात्र की रह गई है, जिसके पुनर्जीवन की माँग ग्रामीणों द्वारा लगातार उठाई जा रही है।

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