Wardha Wildlife Conflict: वर्धा जिले में वन्यजीवों का आतंक लगातार बढ़ता जा रहा है। जंगलों से सटे गांवों और खेतों में हिंसक वन्यजीवों के बढ़ते विचरण के कारण मानव-वन्यजीव संघर्ष का खतरा भी बढ़ गया है। वहीं, जंगली सुअर और नीलगाय जैसे वन्यजीवों के झुंड लगातार खेतों में घुसकर फसलों को नुकसान पहुंचा रहे हैं। इससे किसानों को बड़े आर्थिक नुकसान का सामना करना पड़ रहा है। जिले के प्रादेशिक वनक्षेत्र में पिछले ढाई वर्षों में फसल नुकसान के 18,670 प्रकरण दर्ज किए गए हैं। वन विभाग द्वारा प्रभावित किसानों को करीब 22 करोड़ 67 लाख रुपए का अनुदान वितरित किए जाने की जानकारी है।
जिले के प्रादेशिक वनक्षेत्र में आठ वनपरिक्षेत्र शामिल हैं। इन क्षेत्रों में पिछले कुछ समय से बाघ, भालू, तेंदुआ और जंगली सुअर जैसे वन्यजीवों की गतिविधियां बढ़ी हैं। जंगल से सटे गांवों में आए दिन वन्यजीवों के दिखाई देने से ग्रामीणों में भय का माहौल है। विशेषकर बाघ और तेंदुए की मौजूदगी के कारण ग्रामीणों में दहशत बनी हुई है। हालही में आष्टी तहसील के नरसिंहपुर में बाघ के हमले में एक किसान की मौत की घटना सामने आई थी। इस घटना के बाद क्षेत्र में बाघों को लेकर भय और बढ़ गया है। कई किसान अपनी सुरक्षा को लेकर खेतों में जाने से भी डर रहे हैं। खरीफ की फसल तैयार होने के समय यह समस्या और गंभीर हो जाती है।
किसान कड़ी मेहनत कर खेतों में फसल बोते हैं। फसलें जब लहलहाने लगती हैं, उसी समय जंगली सुअर और नीलगाय के झुंड खेतों में पहुंचकर फसलों को रौंद देते हैं। कई बार वन्यजीव पूरी फसल को तहस-नहस कर देते हैं। इससे किसानों की मेहनत के साथ ही उनकी आर्थिक स्थिति पर भी प्रतिकूल असर पड़ता है। वन्यजीवों से फसलों की सुरक्षा के लिए किसान अपने स्तर पर कोई कठोर कदम भी नहीं उठा सकते, क्योंकि वन्यजीवों को नुकसान पहुंचाने पर उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई हो सकती है। ऐसे में किसानों के सामने अपनी फसलों की रक्षा करने की बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है।
वन्यजीवों के बढ़ते हमलों को देखते हुए किसान केवल मुआवजे पर निर्भर रहने के बजाय स्थायी उपाययोजना किए जाने की मांग कर रहे हैं। जंगल से सटे संवेदनशील क्षेत्रों में वन्यजीवों की गतिविधियों पर निगरानी बढ़ाने, खेतों की सुरक्षा के प्रभावी उपाय करने तथा मानव-वन्यजीव संघर्ष को रोकने के लिए दीर्घकालीन योजना बनाने की आवश्यकता है। किसानों का कहना है कि फसल नुकसान के बाद मिलने वाला अनुदान तत्काल राहत जरूर देता है, लेकिन वन्यजीवों के खेतों में प्रवेश को रोकने के लिए ठोस व्यवस्था होने पर ही समस्या का स्थायी समाधान संभव होगा।