Tur Dal Price Rise Before Festive In Maharashtra: त्योहारी सीजन के पहले खाद्यान्न की कीमतों में तेजी का असर आम आदमी पर दिखाई दे रहा है। रोटी दाल महंगी होती जा रही है। देश में सबसे ज्यादा खाइ पकाई जाने वाली तुअर दाल की कीमतों में तेजी बनी हुई है।
व्यापारियों के अनुसार कमजोर बारिश, सीमित घरेलू उपलब्धता, धीमी आयात आवक और स्टॉकिस्टों की सतर्क बिकवाली के चलते तुअर बाजार में तत्काल राहत के संकेत कम दिखाई दे रहे हैं।
कनफेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (कैट) के उपाध्यक्ष एवं ठाणे जिला होलसेल व्यापारी वेलफेयर महासंघ के अध्यक्ष सुरेश भाई ठक्कर के मुताबिक, मौसम और आपूर्ति की स्थिति फिलहाल बाजार की दिशा तय करने वाले प्रमुख कारक हैं।
कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार देश में तुअर की बुवाई 45.66 लाख हेक्टेयर में हुई है, जो पिछले वर्ष की समान अवधि के 44.93 लाख हेक्टेयर से करीब 1.6 प्रतिशत अधिक है।
हालांकि, रकबा बढ़ने के बावजूद प्रमुख उत्पादक राज्यों में बारिश की कमी ने फसल की संभावित पैदावार को लेकर चिंता बढ़ा दी है। महाराष्ट्र और कर्नाटक में कम बारिश का असर फसल की बढ़ोतरी पर पड़ने की आशंका है। कर्नाटक के कई हिस्सों में सूखे जैसी स्थिति भी बाजार की चिंता बढ़ा रही है।
राज्यवार आंकड़ों में भी बड़ा अंतर देखने को मिला है। उत्तर प्रदेश में तुअर का रकबा 33 प्रतिशत बढ़कर 4.95 लाख हेक्टेयर और झारखंड में 53 प्रतिशत बढ़कर 2.12 लाख हेक्टेयर हो गया। गुजरात, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में भी रकबा क्रमशः 11 प्रतिशत, 17 प्रतिशत और 9 प्रतिशत बढ़ा है।
वहीं कर्नाटक में रकबा 9 प्रतिशत घटकर 12.93 लाख हेक्टेयर, मध्य प्रदेश में 15 प्रतिशत घटकर 2.74 लाख हेक्टेयर और महाराष्ट्र राज्य में करीब 1.5 प्रतिशत घटकर 12 लाख हेक्टेयर रह गया। इसका असर घरेलू बाजार में भी तेजी के रूप में दिखाई दे रहा है।
सितंबर को गुलबर्गा में तुअर 8,500 से 9,400 रुपये प्रति क्विंटल रही, जो पिछले महीने की तुलना में 1,100 रुपये और पिछले साल से 2,668 रुपये अधिक है। अकोला में भाव 8,800-8,825 रुपये प्रति क्विंटल रहे। वहीं तुअर दाल गुलबर्गा में 12,000-12,100 रुपये और अकोला में 12,100-12,300 रुपये प्रति क्विंटल रही।
दाल की कीमतों के नियंत्रण में आयात का काफी असर होता है। इस समय आयात की धीमी गति भी कीमतों को सहारा दे रही है। अफ्रीकी देशों से नई खेप सितंबर के अंतिम हिस्से में पहुंचने की उम्मीद है।
यदि बारिश में सुधार नहीं हुआ और आयातित तुअर की आवक अपेक्षा के अनुरूप नहीं रही, तो त्योहारी सीजन में कीमतों पर दबाव बना रह सकता है। ऐसा व्यापारियों का मानना है।