Industrial Relations Bill Debate News: लोकसभा में गुरुवार को ‘औद्योगिक संबंध संहिता (संशोधन) विधेयक, 2026’ पर चर्चा के दौरान सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच जोरदार नोकझोंक देखने को मिली। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) की महाराष्ट्र से सांसद सुप्रिया सुले ने केंद्र सरकार पर श्रमिक विरोधी रवैया अपनाने का आरोप लगाते हुए कहा कि सरकार लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष (एलओपी) को बोलने नहीं देती और अब प्रस्तावित संशोधन के जरिए मजदूरों की आवाज भी दबाने की कोशिश कर रही है।
सुले ने देशभर में केंद्रीय श्रमिक संगठनों द्वारा आहूत एक दिवसीय हड़ताल का उल्लेख करते हुए कहा कि जब संसद में इस विधेयक पर चर्चा हो रही है, उसी समय बैंकिंग, बीमा, बिजली, परिवहन और असंगठित क्षेत्र के कर्मचारी अपने अधिकारों के लिए सड़क पर उतरने को मजबूर हैं। उन्होंने कहा, “राष्ट्र निर्माण करने वाले लोग आज हड़ताल पर हैं। किसानों और मजदूरों का इस देश को आगे बढ़ाने में सबसे बड़ा योगदान रहा है, लेकिन यह विधेयक उन्हीं के खिलाफ लाया गया है।”
सुप्रिया सुले ने 2023-24 की एक सरकारी रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि देश में कुल 2,12,990 फैक्टरियां हैं, जिनमें से 1,32,722 में 50 से कम श्रमिक कार्यरत हैं। उन्होंने कहा कि पहले श्रमिक संघ (यूनियन) पंजीकरण के लिए 20 कर्मचारियों की आवश्यकता होती थी, जिसे संशोधन के तहत बढ़ाकर 50 कर दिया गया है। उनके अनुसार, इससे छोटे प्रतिष्ठानों में कार्यरत मजदूर यूनियन बनाने के अधिकार से वंचित हो सकते हैं। उन्होंने कहा, “किसी मॉल या 49 कर्मचारियों वाली दुकान में काम करने वाले लोग अब यूनियन नहीं बना सकेंगे। यह श्रमिकों की आवाज को सीमित करने जैसा है।”
सुप्रिया सुले ने दावा किया कि देश में 42 प्रतिशत कर्मचारी अनुबंध पर कार्यरत हैं, जिनमें गिग वर्कर और बीमा क्षेत्र के कर्मचारी भी शामिल हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार ने इन कर्मचारियों के हितों की सुरक्षा के लिए ठोस कदम नहीं उठाए हैं। उन्होंने कहा, “यहां नेता प्रतिपक्ष को भी मुश्किल से बोलने दिया जाता है। अब मजदूरों को भी नहीं बोलने दिया जाएगा।”
विधेयक पर चर्चा के दौरान शिवसेना सांसद रवींद्र वायकर ने संशोधन का समर्थन करते हुए इसे छोटा लेकिन महत्वपूर्ण कदम बताया। उन्होंने कहा कि यह कानून को अधिक स्पष्ट बनाने की दिशा में उठाया गया कदम है। हालांकि, उन्होंने गिग वर्करों के लिए न्यूनतम वेतन और काम के घंटे निर्धारित करने की मांग भी रखी।
सुप्रिया सुले के बयान के बाद महाराष्ट्र की राजनीति में भी हलचल तेज हो गई है। श्रमिक संगठनों के मुद्दे पर केंद्र सरकार और विपक्ष के बीच टकराव और गहरा होने के संकेत मिल रहे हैं। आने वाले दिनों में यह विधेयक संसद और सियासी गलियारों में चर्चा का प्रमुख विषय बना रह सकता है।