Unseasonal Rain in Ratnagiri: महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले में प्रकृति के प्रकोप ने आम के बागवानों को संकट में डाल दिया है। कोंकण क्षेत्र में हुई अचानक बेमौसम भारी बारिश और तेज हवाओं ने विश्व प्रसिद्ध अल्फोंसो यानी 'हापुस' आम की फसल को तहस-नहस कर दिया है। यह बारिश ऐसे संवेदनशील समय पर आई है जब आम के पेड़ों पर बौर (फूल) और छोटे फल लगने की प्रक्रिया अपने चरम पर थी। कृषि विशेषज्ञों और स्थानीय किसानों के अनुसार, इस साल हापुस की पैदावार में 80 से 90 प्रतिशत तक की गिरावट आने की आशंका है, जिससे बागवानों की साल भर की मेहनत पर पानी फिर गया है।
रत्नागिरी और सिंधुदुर्ग जिले हापुस आम के सबसे बड़े उत्पादक केंद्र हैं, जहाँ से यह फल पूरी दुनिया में निर्यात किया जाता है। बेमौसम बारिश के कारण न केवल बौर झड़ गए हैं, बल्कि पेड़ों पर लगे छोटे फल (कैरी) भी गिर गए हैं। जलवायु परिवर्तन के इस अनपेक्षित प्रहार ने कोंकण के कृषि आधारित अर्थतंत्र को हिलाकर रख दिया है। किसान अब सरकार से पंचनामा कर तत्काल आर्थिक सहायता और मुआवजे की मांग कर रहे हैं ताकि वे इस भारी नुकसान से उबर सकें।
आम की फसल के लिए फूल आने का समय सबसे महत्वपूर्ण होता है। अत्यधिक बारिश और उसके बाद बढ़ी नमी के कारण मधुमक्खियों और अन्य परागण करने वाले कीटों की गतिविधियाँ पूरी तरह रुक गई हैं। परागण (Pollination) न होने के कारण फल लगने की प्रक्रिया बाधित हो गई है। इसके अतिरिक्त, बारिश के बाद वातावरण में नमी बढ़ने से 'पाउडरी मिल्ड्यू' जैसे फफूंद जनित रोगों और फल बेधक कीटों का खतरा दोगुना हो गया है। इससे बचे हुए आमों की गुणवत्ता और उनके बाहरी स्वरूप पर भी बुरा असर पड़ना तय है।
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उत्पादन में भारी गिरावट का सीधा असर आम आदमी की जेब पर पड़ने वाला है। मांग और आपूर्ति के गणित को देखते हुए इस साल हापुस आम के दाम रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच सकते हैं। आमतौर पर मार्च और अप्रैल के महीने में हापुस बाजारों में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होता है, लेकिन इस बार फसल की बर्बादी के कारण आम की आवक बेहद कम रहेगी। व्यापारियों का मानना है कि इस साल आम का स्वाद चखना आम जनता के लिए काफी महंगा सौदा साबित होगा, क्योंकि उच्च गुणवत्ता वाले निर्यात श्रेणी के आमों की संख्या बहुत कम रह गई है।
बेमौसम बारिश का कहर केवल आम के बागों तक सीमित नहीं रहा है। रत्नागिरी जिले में आम के साथ-साथ काजू और खेतों में तैयार खड़ी अन्य फसलों को भी भारी नुकसान पहुँचा है। कोंकण के हजारों परिवार अपनी आजीविका के लिए पूरी तरह आम और काजू के सीजन पर निर्भर रहते हैं। फसल के नुकसान के साथ-साथ कीटनाशकों और दवाओं पर किया गया निवेश भी डूब गया है। किसानों का कहना है कि यदि जल्द ही शासन स्तर पर मदद नहीं पहुँची, तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था में बड़ा संकट पैदा हो सकता है।