Pune Farmer Seeks Permission To Grow Ganja: पुणे जिले से एक ऐसी खबर सामने आई है जिसने न केवल प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मचा दिया है, बल्कि देश के कृषि संकट की एक दहला देने वाली तस्वीर भी पेश की है। बाजार की अनिश्चितता और खेती की बढ़ती लागत से तंग आकर पुणे के एक किसान ने तहसीलदार को पत्र लिखकर एक ऐसी मांग की है, जिसे सुनकर हर कोई दंग है। इस हताश किसान ने दो टूक शब्दों में कहा है, अब प्याज उगाना हमारे बस की बात नहीं, हमें गांजा उगाने की अनुमति दी जाए।
यह चौंकाने वाला मामला पुणे जिले के जुन्नर तहसील के डिंगोरे गांव का है। यहां के किसान सुनील उकिर्डे ने इस साल के सीजन में अपनी 10 एकड़ जमीन पर बड़ी उम्मीदों के साथ प्याज की फसल उगाई थी। सुनील के अनुसार, प्याज की खेती अब मुनाफे का सौदा नहीं, बल्कि गले की फांस बन गई है। उन्होंने आंकड़ों के जरिए अपनी व्यथा सुनाई, एक एकड़ में प्याज लगाने और उसे पालने का खर्च करीब 1 लाख 20 हजार रुपये आता है। लेकिन जब फसल बाजार में पहुंचती है, तो सरकार और नाफेड (NAFED) की ओर से दिया जाने वाला भाव ऊंट के मुंह में जीरे के समान है।
सुनील उकिर्डे का कहना है कि सरकार ने प्याज की खरीदी के लिए महज 12.35 रुपये प्रति किलो का दर तय किया है। यह भाव इतना कम है कि किसान की लागत निकलना तो दूर, उसे प्रति एकड़ 40 से 45 हजार रुपये का सीधा नुकसान उठाना पड़ रहा है। सुनील ने प्रशासन से तीखा सवाल पूछा है कि इस भारी आर्थिक घाटे की भरपाई आखिर कैसे होगी?
तहसीलदार को दिए अपने पत्र में किसान ने अपनी आर्थिक स्थिति का हवाला देते हुए लिखा है कि प्याज जैसे कैश क्रॉप ने उन्हें पूरी तरह निराश किया है। उनका कहना है कि यदि उन्हें इस घाटे से उबरना है और अपने परिवार का भरण-पोषण करना है, तो उनके पास गांजा उगाने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा है। एक अन्नदाता द्वारा खुलेआम गांजा उगाने की अनुमति मांगना, वर्तमान कृषि नीतियों की विफलता पर एक बड़ा तमाचा माना जा रहा है।
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जैसे ही यह पत्र सोशल मीडिया और प्रशासनिक हलकों में वायरल हुआ, पूरे पुणे क्षेत्र में खलबली मच गई है। लोग हैरान हैं कि एक मेहनती किसान आखिर कितना मजबूर हो गया होगा कि उसने इस तरह की अजीब और कानूनी रूप से प्रतिबंधित मांग सरकार के सामने रख दी। सुनील उकिर्डे का यह पत्र महज एक किसान की मांग नहीं, बल्कि उन हजारों किसानों का आक्रोश है जो महंगाई और सरकारी अनदेखी की मार झेल रहे हैं। फिलहाल प्रशासन की ओर से इस पर कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है, लेकिन सुनील के इस कदम ने कृषि क्षेत्र के भीषण वास्तविकताओं पर एक नई और तीखी बहस छेड़ दी है।