

Delhi Building Collapse: दिल्ली के सत्य निकेतन बिल्डिंग हादसे ने पुराने हादसों की यादे ताजा कर दी। यह पहली बार नहीं है कि दिल्ली में कोई इमारत ढही हो, लेकिन उससे सबक न लेना यह बड़ा सवाल खड़ा करता है। पुलिस, प्रशासन और सरकार किस तरह से हादसे के बाद लकीर पीटते हैं। अपना दुख जाहिर करते हैं। लेकिन घटना के कुछ दिन बाद ही उसे भूल जाते हैं।
इसका एक बड़ा प्रमाण सत्य निकेतन में अवैध छात्र हॉस्टल का ढहना है। जिस जगह यह बिल्डिंग ढही है। उससे करीब 50 या 70 मीटर दूर ही आज से करीब 3 साल पहले एक अन्य बिल्डिंग ढह गई थी जिसमें वहां काम कर रहे दो मजदूरों की मौत हो गई थी। जबकि करीब एक दर्जन लोग घायल हो गए थे।
इस हादसे में वहां निर्माण कार्य करने वाले ठेकेदार को जेल भी हुई थी। लेकिन उसके बाद भी पुलिस और प्रशासन ने उस हादसे से किसी तरह का सबक नहीं लिया। जिसकी वजह से यह एक बड़ा हादसा हो गया। जिसमें 7 बच्चों की मौत की सूचना सामने आ रही है और 12 लोगों को रेस्क्यू किया गया है। जबकि कई बच्चों के बिल्डिंग के अंदर दबे होने की आशंका जाहिर की जा रही है।
सत्य निकेतन के स्थानीय निवासियों का कहना है कि हॉस्टल कारोबार की वजह से कॉलोनी का पूरा वातावरण बदल गया है। यहां पर नेताओं ने हॉस्टल चलाने वालों के साथ गठजोड़ कर लिया है। इसके अलावा स्थानीय लोगों को भी लालच आ गया है। वह हॉस्टल चलाकर अपनी आजीविका कमाने लगे हैं।
इसमें कोई गलत बात नहीं है। लेकिन उन्हें सुरक्षा का ध्यान रखना चाहिए। हर बिल्डिंग का सुरक्षा ऑडिट होना चाहिए। अगर हॉस्टल चला रहे हैं तो बच्चों की सुरक्षा और स्वास्थ्य के मानक पूरे होने चाहिए। इसके अलावा यह भी देखा जाना चाहिए कि उस बिल्डिंग को लेकर पहले से कोई नोटिस या सरकारी आदेश तो जारी नहीं हुआ है।
सत्य निकेतन के एक स्थानीय निवासी एनसी गुप्ता ने कहा कि उनकी कालोनी में करीब 80-90 हॉस्टल चल रहे होंगे। जब ऐसा कोई हादसा होता है। उसके बाद पुलिस प्रशासन सख्ती दिखाता है। लेकिन उनकी यह कार्रवाई यह होती है कि वह मकान मालिक को तंग करें। उनसे पैसे बनाने का अवसर हासिल करें। वह बच्चों की वेरिफिकेशन को लेकर सवाल करते हैं। लेकिन यह नहीं देखते हैं कि क्या सुरक्षा के मानक बिल्डिंग में अपनाए गए हैं।
अगर कोई बच्चों को परिवार की तरह रख रहा है। उसे तंग करते हैं। लेकिन कारोबार के लिए हॉस्टल चलाने वालों से एक भी सवाल नहीं करते हैं। यह नहीं देखा जाता है कि बच्चों को किस तरह का खाना दिया जा रहा है। यह भी नहीं देखा जाता है कि दुकानदार उनसे हर वस्तु के दोगुने दाम क्यों वसूल रहे हैं।
सरकार इस तरह के हॉस्टल को लेकर कड़े नियम बनाए। यह देखे कि क्या उन नियमों का पालन किया गया है। इसे बिल्डिंग के बाहर बोर्ड लगाकर प्रदर्शित भी किया जाए। यह बताया जाए कि उस बिल्डिंग में किन-किन नियमों को पूरा किया गया है। हॉस्टल के मालिक का नाम और फोन नंबर, उसके संचालक का नाम और फोन नंबर भी होना चाहिए।
सत्य निकेतन में जो अवैध हॉस्टल ढहा है। उसके 3 तरफ से कोई सपोर्ट नहीं था। यही वजह है कि जब बरसात के बाद उसके बेसमेट और नींव तक पानी गया तो वह भर-भरा कर गिर गई। यह हादसा इस वजह से भी हुआ कि तीन तरफ से बिना सपोर्ट वाली पांच मंजिला बिल्डिंग के नीचे बेसमेंट भी खोदी जा रही थी।
उसके लिए भी कोई सुरक्षा मानक नहीं अपनाए गए थे। यही नहीं, इस बिल्डिंग के साथ पूर्वोतर की छात्राओं का एक अन्य ऐसा ही निजी संचालन वाला हॉस्टल है। यह बताया जा रहा है कि उसके भी एक किनारे की दीवार खोखली हो रही है। जब यह बिल्डिंग गिरी तो छात्राओं का यह हॉस्टल भी हिलने लग गया था। जिससे वहां रहने वाले बच्चे भी डर गए थे।
हालांकि, दिल्ली पुलिस ने इस हादसे के बाद छात्राओं के हॉस्टल को भी खाली करा दिया है। लेकिन यह सवाल अपनी जगह बना हुआ है कि क्या हादसे से पहले ही इसकी जांच नहीं होनी चाहिए थी।
सत्य निकेतन में ढहने वाली बिल्डिंग के आसपास रहने वाले छात्रों का कहना है कि यह बताया जा रहा है कि यह बिल्डिंग तीन-चार महीने से ही छात्र हॉस्टल के रूप में शुरू की गई है। जबकि यह झूठ है। इस बिल्डिंग में कई छात्र पिछले एक साल से भी रह रहे थे। हालांकि इस अगस्त के बाद बिल्डिंग पूरी तरह से भर गई है।