सांकेतिक फोटो (सोर्स: एआई फोटो) 
पुणे

असुरक्षित होती सांस्कृतिक राजधानी: पुणे में 22 दिनों में 123 महिलाएं और लड़कियां लापता, प्रशासन मौन क्यों?

Pune Crime News: पुणे में पिछले 22 दिनों में 123 महिलाएं और लड़कियां लापता हुई हैं। बढ़ते क्राइम व मासूमों के साथ बढ़ते अपराधों के बीच इन आंकड़ों ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

गोरक्ष पोफली

Pune Crime Update: जिसे कभी महाराष्ट्र की सांस्कृतिक और शिक्षा की राजधानी कहा जाता था, वह शहर आज डर और असुरक्षा के साये में जीने को मजबूर है। पिछले कुछ समय से पुणे से ऐसी खबरें आ रही हैं जो न केवल दिल दहला देने वाली हैं, बल्कि प्रशासन की मुस्तैदी पर भी गहरा प्रहार करती हैं। ताज़ा आंकड़ों ने पूरे शहर और राज्य को झकझोर कर रख दिया है पुणे शहर और आसपास के इलाकों से पिछले मात्र 22 दिनों में 123 महिलाएं और लड़कियां लापता हो गई हैं।

आंकड़े जो डराते हैं

लापता होने की यह दर औसत रूप से हर दिन 5 से अधिक है। इनमें न केवल वयस्क महिलाएं शामिल हैं, बल्कि कई नाबालिग लड़कियां भी हैं। पुणे में पहले से ही नई कोयता गैंग का आतंक चरम पर रहा है, जहाँ सरेआम हथियार लहराकर दहशत पैदा की जाती है। इसी बीच मासूम बच्चियों के साथ बढ़ते अश्लील अपराधों और अब इन गुमशुदगी के मामलों ने पुलिस प्रशासन की कार्यप्रणाली को कठघरे में खड़ा कर दिया है।

सुप्रिया सुले का तीखा प्रहार

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद चंद्र पवार) की सांसद सुप्रिया सुले ने इन आंकड़ों को लेकर राज्य सरकार और गृह विभाग पर कड़ा हमला बोला है। उन्होंने सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि पुणे शहर और परिसर में पिछले 22 दिनों में 123 लड़कियां और महिलाएं लापता हुई हैं। यह गृह विभाग के कामकाज की पोल खोलता है। यह राज्य अब महिलाओं के लिए सुरक्षित नहीं रहा। एक तरफ अत्याचार बढ़ रहे हैं और दूसरी तरफ यह गायब होने के आंकड़े यह चित्र महाराष्ट्र के लिए अत्यंत शर्मनाक है। सुले ने आगे कहा कि यदि सरकार महिलाओं को सुरक्षित वातावरण नहीं दे सकता, तो यह सत्ता में बैठे लोगों के लिए बेहद शर्म की बात है।

कोयता गैंग और कानून-व्यवस्था की चुनौती

पुणे में कानून-व्यवस्था की स्थिति पिछले कुछ महीनों से डांवाडोल नजर आ रही है। नई कोयता गैंग के सदस्य गलियों में खुलेआम हथियार लेकर घूमते हैं, लागाें की करों पर पत्थर मारते है, एक के बाद एक गाडियों से जाकर जोर जाेर से हॉर्न बजाते है, जिससे आम जनता में डर का माहौल है। जब पुलिस एक समस्या को सुलझाने का दावा करती है, तब गुमशुदगी की यह नई रिपोर्ट सामने आ जाती है। जानकारों का मानना है कि इन लापता महिलाओं के पीछे मानव तस्करी या किसी संगठित गिरोह का हाथ हो सकता है, जिसकी गहराई से जांच होनी अनिवार्य है।

प्रशासन की चुप्पी और जनता का आक्रोश

स्थानीय निवासियों का कहना है कि पुलिस पेट्रोलिंग केवल मुख्य सड़कों तक सीमित रह गई है। रिहायशी इलाकों और बाहरी क्षेत्रों में सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम नहीं हैं। 22 दिनों में 123 महिलाओं का गायब होना कोई मामूली घटना नहीं है। यह एक पब्लिक सेफ्टी इमरजेंसी जैसी स्थिति है।

पुणे जैसे महानगर में अगर बेटियां सुरक्षित नहीं हैं, तो यह प्रगति का दावा खोखला नजर आता है। प्रशासन को चाहिए कि वह केवल सीसीटीवी कैमरों के भरोसे न रहकर, जमीनी स्तर पर खुफिया तंत्र को मजबूत करे और इन लापता महिलाओं की तलाश के लिए विशेष अभियान चलाए। क्या गृह विभाग जागकर इन परिवारों को उनकी बेटियां वापस लौटा पाएगा? यह बड़ा सवाल बना हुआ है।

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