पिंपरी चिंचवड नगर निगम घोटाला (फोटो क्रेडिट-X) 
पुणे

2800 करोड़ की एफडी पर 7 करोड़ का डाका; पिंपरी-चिंचवड के मुख्य लेखाकार प्रवीण जैन का नया कारनामा उजागर

Pimpri Chinchwad CAO Pravin Jain FD Fraud Abhishek Barne: पुणे में PCMC के मुख्य लेखाकार प्रवीण जैन ने 2800 करोड़ की एफडी के ब्याज में किया 7 करोड़ का गबन। स्थायी समिति का फूटा गुस्सा।

अनिल सिंह

Pimpri Chinchwad PCMC Scam: पिंपरी-चिंचवड महानगरपालिका के मुख्य लेखा अधिकारी प्रवीण जैन के खिलाफ चल रही विभागीय और कानूनी जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, भ्रष्टाचार की परतें उतनी ही तेजी से खुलती जा रही हैं। मौजूदा नगर आयुक्त विजय सूर्यवंशी द्वारा गठित विशेष जांच समिति की प्राथमिक रिपोर्ट में यह साफ हो गया है कि जैन ने नगर निगम के खजाने को अपनी निजी जागीर समझ लिया था। 60 करोड़ के पुराने घोटाले की फाइलें अभी बंद भी नहीं हुई थीं कि 2800 करोड़ के फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) के ब्याज में 7 करोड़ की नई डकैती का मामला आधिकारिक रूप से सामने आ गया है।

इस महा-घोटाले की टाइमलाइन को सार्वजनिक करते हुए स्थायी समिति के अध्यक्ष अभिषेक बर्ने ने सीधे तौर पर तत्कालीन नगर आयुक्त और प्रशासक शेखर सिंह की भूमिका पर भी उंगली उठाई है। बर्ने का आरोप है कि शेखर सिंह के कार्यकाल के दौरान, साल 2024 में 1810 करोड़ और साल 2025 में लगभग 1000 करोड़ की भारी-भरकम राशि विभिन्न बैंकों में जमा रखी गई थी। मुख्य लेखाकार जैन ने इन बैंकों के प्रबंधकों के साथ मिलकर ब्याज दरों और भुगतान में ऐसी चालबाजी की कि सीधे 7 करोड़ का वित्तीय नुकसान पिंपरी-चिंचवड नगर निगम को उठाना पड़ा। बर्ने ने दावा किया है कि यह रिपोर्ट अभी अधूरी है और संशोधित रिपोर्ट आने पर घोटालों का यह आंकड़ा 100 करोड़ के पार जा सकता है।

52 करोड़ के टेंडर घोटाले पर महायुति में गृहयुद्ध

इस वित्तीय धांधली के बीच पिंपरी-चिंचवड की राजनीति में उस समय भूचाल आ गया जब 52 करोड़ के एक अन्य भ्रष्टाचार मामले को लेकर महायुति (सत्तारूढ़ गठबंधन) के घटक दल ही आपस में भिड़ गए। एक संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित कर शिवसेना (शिंदे गुट) और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (अजित पवार गुट) के स्थानीय नेताओं ने अपनी ही सहयोगी भारतीय जनता पार्टी (BJP) पर तीखा पलटवार किया।

भाजपा विधायकों के करीबियों पर संगीन आरोप

इससे पहले मुख्य लेखाकार प्रवीण जैन ने खुद को बचाने के लिए दावा किया था कि सभी दलों के पार्षदों के हस्ताक्षर के बाद ही ठेकेदारों के 52 करोड़ के बिलों का भुगतान किया गया था। इस दावे को सिरे से खारिज करते हुए शिवसेना और राकांपा के पार्षदों ने सवाल उठाया कि जिन बिलों के आधार पर ठेकेदारों की तिजोरियां भरी गईं, उन पर उनके किसी भी प्रतिनिधि के हस्ताक्षर हैं ही नहीं। विपक्ष और सहयोगियों का सीधा संदेह है कि जिन ठेकेदारों को यह मलाई बांटी गई, वे भाजपा के कद्दावर विधायक महेश लांडगे और शंकर जगताप के बेहद करीबी सहयोगी हैं।

गहन और निष्पक्ष जांच की उठती मांग

महायुति के भीतर मचे इस घमासान के बाद अब मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री स्तर पर इस मामले को सुलझाने का दबाव बढ़ गया है। शिवसेना और अजित पवार गुट ने दो टूक शब्दों में मांग की है कि इस पूरे सिंडिकेट को बेनकाब करने के लिए न केवल भ्रष्ट अधिकारी प्रवीण जैन, बल्कि उन तमाम ठेकेदारों, फर्जी हस्ताक्षर करने वाले पूर्व पार्षदों और पर्दे के पीछे से फाइलों को पास कराने वाले राजनीतिक आकाओं की उच्च स्तरीय जांच होनी चाहिए।

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